सोलह मई की चिरप्रतीक्षित तारीख का आगमन होने वाला था। चुनाव प्रचार आदि कर्मो से निवृत्त होकर गुरुघंटाल अपने दृढ़ आसन पर विराजमान थे। चुनावी नतीजों के आने के उपरांत उनके आसन के खिसक जाने के अनुमान लगने आरंभ हो चुके थे। सहसा गुरुघंटाल का परम पटु शिष्य चंपू आता हुआ दिखाई दिया। चंपू ने समीप आकर गुरुदेव के चरणस्पर्श किए।
गुरु घंटाल के आसन का कोना पकड़कर श्रद्धातिरेकवश तिरछा होता हुआ बोला - गुरुवर, आज मेरा चित्त अत्यंत उद्विग्न है। जय-पराजय के झूले में झूल रहा है। कलिकाल के वामन अवतार प्रत्याशियों और स्टार प्रचारकों ने पांच चरणों में सकल भारत भूमि को नाप डाला है। सोलह मई आने वाली है। पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव परिणाम आने वाले हैं। आप तो सर्वज्ञाता हैं। आपने लोकतंत्र में घाट-घाट का पानी पी रखा है। अतैव आप सोलह की महिमा का साक्षात वर्णन कीजिए, जिससे मेरे इस क्षण-क्षण परिवर्तनशील चित्त में परम शांति का समावेश हो सके।
यह सुनकर गुरुघंटाल ने सर्वप्रथम अपने आसन के कोने को शिष्य चंपू के चंगुल से छुड़ाने का उपक्रम किया। सफल होकर मुस्कराते हुए बोले - वत्स चंपू, मैं जानता हूं, तुम कितने घुटे हुए हो। ऐसा कौन-सा कारनामा है, जो तुमसे छूटा हो। तुम स्वयं एक नंबर के ज्ञानी हो। सोलह कलाओं में निष्णात हो। तथापि आज शरणागत हो, इसलिए मैं तुम्हारी सोलह संबंधी जिज्ञासा को शांत करने की कोशिश करूंगा। चंपू ने गुरुघंटाल के चरणों में पसरते हुए कहा - ऐसा कुछ भी नहीं है प्रभो। शंका और भय मानव स्वभाव हैं। ऊंचे से ऊंचे व्यक्ति में नीचता का समान प्रतिशत देखा गया है। इस बार के चुनाव परिणामों के निमित्त सोलह तारीख का ही चयन क्यों किया गया? आज आपको मेरी इस शंका का समुचित समाधान करना ही होगा।
तब गुरुघंटाल उवाचे - वत्स, तुम तो जानते ही हो, चुनाव लोकतंत्र का एक धार्मिक अनुष्ठान है। इसमें लाखों टन तेल और करोड़ों लीटर पसीना स्वाहा हो जाता है। अरबों रुपए की प्रचार और व्यवस्था रूपी हवन सामग्री झोंक दी जाती है। महापंडितों की जिह्वा गलत-सलत मंत्र पढ़-पढ़कर ऐंठने लग जाती है, इसीलिए इसे डेमोक्रेसी का महायज्ञ कहा गया है। और चूंकि अपने यहां धरम-करम में सोलह का विशेष महत्व होता है। कदाचित इसीलिए निर्वाचन आयोग ने परिणाम की तारीख सोलह निर्धारित की है।
चंपू बोला - गुरु प्रवर, आप तो बापों के भी बाप हैं। मगर मैं भी आपको सस्ते में छोड़ने वाला नहीं हूं। मतदाता पप्पू बन सकते हैं, मैं नहीं। आप आज मुझको यूं ही नहीं टरका सकेंगे। मैं इस सोलह वाले मसले पर सोलह आने पूर्ण प्रवचन का आकांक्षी हूं। तब गुरुघंटाल पुन: बोले - प्रिय चंपू, तू तो महाचिपकू है रे। सोलह साल के छोकरे सी जिद कर रहा है। और जिद से सबकुछ संभव है। तो सुनो, सोलह संस्कार होते हैं। षोडश विधियां, षोडश कलाएं होती हैं। षोडश गण होते हैं। षोडशोपचार, षोडश दान तथा षोडश मातृका की चर्चा भी संभवत: तुमने सुन ही रखी होगी और सोलह की खतरनाक उमर और सोलह श्रंगार के बारे में तो तुमको सब ज्ञात ही होगा। क्या आगे और भी बताऊं?
चंपू मगन होता हुआ बोला - अवश्य गुरुदेव। सोलह का महात्म्य सविस्तार सुनने की उत्कंठा है। गुरुघंटाल बोले - भाई, आज की राजनीति के सोलह श्रंगार हैं - चमचत्व का उबटन लगाना, भ्रष्टाचार की गढ़ैया में स्नान करना, दबंगई के वस्त्र पहनना, स्वार्थ के केश संवारना, घोटालों का काजल लगाना, अपनी मांग भर लेना, उद्दंडता का महावर लगाना, मस्तक पर कुयश का तिलक लगाना, औरों के चिबुक पर चोट का टीका लगाना, जनता के पांवों में विवशता की मेहंदी लगा देना, भय की सुगंध लगाना, गन का गहना पहनना, मय की मिस्सी लगाना, प्रवंचना का पान खाना, होठों को मालामाल करना और अभिनंदन की माला पहनना। इतना ही नहीं, श्राद्ध आदि के समय दिए जाने वाले सोलह दान, कन्यादान और गोदान से भी बड़ा दान कहा गया है मतदान। जनता इस एक मतदान के माध्यम से सहस्र दानों के बराबर का पुण्य अर्जित कर लेती है।
और जो अपने यहां षोडश मातृका कही गई हैं, वे सोलह देवियां हैं : गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, लक्ष्मी, शांति, पुष्टि, धृति, तुष्टि और आत्मदेवता। और आज की सोलह देवियां हैं : सोनिया, माया, ललिता, ममता, मेनका, शीला, सुषमा, उमा, प्रियंका, राबड़ी, वृंदा, वसुंधरा, रीता, रेणुका, हेमा और जयाप्रदा।
चुनाव परिणाम आने में अब ज्यादा दिन न होने के कारण गुरुघंटाल को बहुमत प्राप्ति के लिए देवता की पूजा के निमित्त षोडशोपचार सामग्री की व्यवस्था के लिए प्रस्थान करने की उत्सुकता थी। वे उठने लगे तो चंपू बोला - गुरुदेव, जाते-जाते तनिक सोलह संस्कारों वाली बात पर भी प्रकाश डालते जाइए। गुरुघंटाल अपने डगमगाते आसन से उचकते हुए बोले - बच्च, अगर राजनीति में संस्कार ही होते तो हम-तुम यहां न होते।