असली खेल तो अब होगा
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असली खेल तो अब होगा

sardesaiराजनीतिक पत्रकार होने की एक नियति यह भी है कि आपसे चुनावी नतीजों के सटीक आकलन की उम्मीद की जाती है। यह आपकी यूएसपी के लिए काफी मायने रखता है। यह आपके डिनर के आमंत्रण का आधार होता है। यद्यपि पिछले कुछ हफ्तों से २क्क्९ के चुनाव के पूर्वानुमानों के बारे में बार-बार पूछे जाने पर सीधी और ईमानदारीपूर्ण प्रतिक्रिया यही रही है कि ‘मैं नहीं जानता।’ भारतीय चुनाव में इससे पहले कभी लोग अंतिम नतीजों को लेकर इतने असमंजस की स्थिति में नहीं रहे। संभवत: पिछले आम चुनाव का हौआ अब भी हमें सता रहा है और इसीलिए हम थोड़े चौकन्ने हैं। और सटीक ढंग से कहें तो यह उस हकीकत को प्रतिबिंबित करता है कि भारतीय आम चुनाव अब एक चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि संभवत: ५४३ चुनाव एक साथ चल रहे होते हैं, जहां तकरीबन प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के अपने ही मसले और नेता या प्रत्याशी होते हैं।

मिसाल के तौर पर मुंबई को लें। यदि उत्तर मुंबई में नदारद रहने वाले सांसद गोविंदा मतदाताओं के लिए खुद एक मुद्दा बन गए तो पड़ोसी उत्तर-पश्चिम सीट में झुग्गीवासियों का पुनर्वास एक बड़ा मुद्दा रहा। दक्षिण मुंबई के एक वर्ग को २६/११ की त्रासदी परेशान करती है तो इसी निर्वाचन क्षेत्र का दूसरा वर्ग असुरक्षित पुरानी इमारतों को लेकर चिंतित नजर आया। ऐसे में एक शहर में भी चुनावी रुझानों के बारे में सहज पूर्वानुमान कैसे लगाया जा सकता है, जबकि एक ही निर्वाचन क्षेत्र में इतने अलग-अलग मुद्दे हावी हों?

परिसीमन ने पूर्वानुमानों को और जोखिम भरा बना दिया। निर्वाचन क्षेत्रों के नक्शों के पुनर्निर्धारण के बाद पीछे कोई इतिहास नहीं बचा, कोई पहले के रुझान नहीं बचे, जिन्हें विश्वसनीय मापक के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके। परिसीमन ने कई निर्वाचन क्षेत्रों की जन-सांख्यिकी को नाटकीय ढंग से बदल दिया। एक बार फिर दक्षिण मुंबई की मिसाल लें तो धनाढ्यों से भरे पैडर रोड के साथ अब न सिर्फ कालबादेवी का मध्य वर्ग आ मिला है, बल्कि मराठी कामगारों की मजबूत पकड़ वाला परेल इलाका भी है।

एक और नई चुनौती हर चुनाव की प्रतिस्पर्धात्मकता है। देश में बहुत कम निर्वाचन क्षेत्र ही ऐसे बचे हैं, जिनमें दो पार्टियों या प्रत्याशियों के बीच सीधी लड़ाई हो। तकरीबन हर निर्वाचन क्षेत्र में बाहुबली बागी नेता निर्दलीय के तौर पर मैदान में हैं या फिर छोटी पार्टियां खेल बिगाड़ने का काम कर रही हैं। क्या राज ठाकरे की मनसे महाराष्ट्र में और मुस्लिम बहुल एयूडीएफ असम में यही भूमिका निभाएगी? आंध्र में चिरंजीवी किस बड़ी पार्टी को ज्यादा नुकसान पहुंचाएंगे? विजयकांत तमिलनाडु में कितने फीसदी मत हासिल करेंगे? पूरे देश में बसपा कितने फीसदी मत हासिल करेगी? ऐसे कई सवालों के जवाब से ही भारत की इस महाचुनावी पहेली को सुलझाने में मदद मिलेगी।

फिर भी तमाम वैधानिक चेतावनियों के साथ और पूर्वानुमानों के पूरी तरह से गलत होने के आरोप झेलने से पहले कुछ बुनियादी रुझानों पर निगाह डाल लें तो बेहतर है। यह साफ है कि ‘राष्ट्रीय’ पार्टी की परिभाषा को पुनर्निर्धारित करना होगा। कांग्रेस कई बड़े राज्यों में अपने घटते प्रभाव के चलते ५४३ लोकसभा सीटों में से ३क्क् से कुछ ज्यादा सीटों पर ही गंभीरतापूर्वक चुनाव लड़ रही है। भाजपा, जिसका भौगोलिक क्षेत्र कहीं ज्यादा सीमित है, इससे भी कम सीटों पर होड़ में है। ऐसे में कोई आश्चर्य की बात नहीं कि दोनों बड़ी ‘राष्ट्रीय’ पार्टियां अकेली सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर तकरीबन १६क् या लोकसभा की कुल सीटों में से एक-तिहाई से भी कम सीटें जीतने की उम्मीद कर रही हैं। इसके साथ-साथ यह भी उतना ही सही है कि तथाकथित तीसरा मोर्चा वास्तव में एक लचर गठबंधन है, जो इसके नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के आधार पर बना है। ऐसा मोर्चा जो १५क् के आंकड़े को पार करता हुआ नजर नहीं आता, कदाचित ही गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा के संयोजक विकल्प का आधार बन सकता है।

इसी वजह से कह सकते हैं कि करोड़ों भारतीयों ने भले ही इस चुनाव के पांच थकाऊ राउंड्स में वोट डालने के लिए तेज गर्मी का हिम्मत से सामना किया हो, लेकिन इसका नॉकआउट राउंड (छठा और सबसे महत्वपूर्ण) वास्तव में १६ मई से ही शुरू होगा। जब नेतागण चुनाव के बाद के विकल्पों पर बात करते हैं तो वे अधिसंख्य मतदाताओं का भरोसा जीतने में अपनी नाकामी को ही स्वीकारते हैं, भले ही यह एकल पार्टी के तौर पर हो या चुनाव-पूर्व गठबंधन के तौर पर। चुनावी जनादेश की महत्ता घटाते हुए चुनाव बाद गठजोड़ की बात की जा रही है, जो वैचारिक प्रतिबद्धता से ज्यादा व्यावहारिकता पर आधारित है।

भारतीय राजनीति में ऐसे किंगमेकरों की कमी नहीं है। प्रकाश करात भले वैचारिक आधार पर भाजपा और कांग्रेस से दूरी बनाकर चलते हों पर उनके इर्द-गिर्द तकरीबन सभी लोगों का ऐसा सख्त नजरिया नहीं है। जयललिता की केमिस्ट्री भाजपा के साथ हो सकती है, लेकिन उनका गणित बताता है कि उनकी करुणानिधि सरकार को गिराने की ख्वाहिश कांग्रेस के जरिए ही पूरी हो सकती है। मायावती भले ही कांग्रेस और भाजपा दोनों से भिड़ रही हों, लेकिन वे खुशी-खुशी इनमें से किसी के साथ भी समझौता कर सकती हैं, जो उन्हें देश का पहला दलित प्रधानमंत्री बना दे।

शरद पवार महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ जुड़ सकते हैं, लेकिन वे किसी के साथ भी समझौता कर सकते हैं, जो उन्हें दिल्ली की गद्दी तक पहुंचा दे। नीतीश कुमार को भले ही नई धर्मनिरपेक्ष उम्मीद के तौर पर प्रोजेक्ट किया गया हो, लेकिन एनडीए की एक रैली में नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मौजूदगी से लगता है कि वे फिलहाल बिहार के मुख्यमंत्री ही बने रहना चाहते हैं। नवीन पटनायक को भले ऐन चुनाव से पहले संघ परिवार के स्याह पक्ष के बारे में पता लगा हो, लेकिन उड़ीसा विधानसभा में खंडित जनादेश उन्हें फिर अपने पुराने सहयोगियों के पास ले जा सकता है। पीएमके और पासवान की लोक जनशक्ति जैसी छोटी पार्टियां भी किसी केसाथ भी जुड़ जाएंगी, जो उन्हें केंद्रीय कैबिनेट में स्थायी सीट देने का वादा करे।

२क्क्९ के जनादेश को भारतीय राजनीति के अध्याय में एक और कड़ी के रूप में देखना होगा, जिसकी शुरुआत दो दशक पहले हुई थी, जब कांग्रेस के एकाधिकार को पहली बार गंभीर चुनौती मिली थी। तब से उपजा निर्वात न तो भाजपा और न क्षेत्रीय ताकतों द्वारा पूरी तरह से भरा जा सका। आज भारत की राजनीतिक स्थिति टूटे हुए आईने की तरह है, जहां हर राजनीतिक पार्टी टूटे कांच के टुकड़ांे को प्रतिबिंबित करती है। बिखरे हिस्सों को एक साथ जोड़ना हमेशा ही कठिन और कष्टसाध्य प्रक्रिया होती है और इसी वजह से संभवत: हम मुश्किल दौर से गुजर सकते हैं।

-लेखक आईबीएन नेटवर्क के एडिटर इन चीफ हैं।



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