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[an error occurred while processing this directive]परिवार के मूल्य और उपयोगिता को क्या कभी भी कम करके आंका जा सकता है? इस आततायी संसार में गर्भ में जीवन धारण करने के साथ ही परिवार हमारे सबसे निकट होता है। एक जगह, जहां प्यार और देखभाल होती है, जहां हम दूसरों के साथ व्यवहार करना और जीना सीखते हैं, मूल्यों को आत्मसात करते हैं और जीवन के लिए तैयार होते हैं।
परिवार के महत्व की पूरी तरह वही समझ सकते हैं, जो परिवार के सुख से वंचित हैं। परिवार का कोई विकल्प नहीं होता। पूरे समाज की आरोग्यता का अनुमान परिवार संस्था की आरोग्यता से लगाया जा सकता है। जब परिवारों में झगड़े होते हैं और परिवार टूटते हैं तो समाज का आधार भी दरकता है।
आप कह सकते हैं कि अभी हम एक ऐसे ही समय में जी रहे हैं। पूरी दुनिया में आधुनिक जीवनशैली के दबाव में परिवार बिखर रहे हैं। इस जीवनशैली में अति उपभोक्तावाद, पितृसत्ता की जकड़बंदी, बहुत तेजी के साथ आ रहे बदलाव और परिवार में दो लोगों का कमाना जैसे कारण शामिल हैं।
फिर भी अगर हम बहुत करीब से देखें तो मेरा मानना है कि जो कुछ हम देख रहे हैं, वह समाज के एक रूप से दूसरे रूप में स्थानांतरित होने और खुद को एक ज्यादा स्थिर भूमिका में ढालने की कवायद है। हम बड़े परिवर्तनों की कगार पर खड़े हैं।
यह कलियुग से सतयुग का परिवर्तन है और मेरा विश्वास है कि परिवार इस परिवर्तन के लिए तैयार हैं। भविष्य के परिवार कैसे होंगे? पति और पत्नी एक-दूसरे के साथ समानता का व्यवहार करेंगे और परिवार की जिम्मेदारियां बांटेंगे। प्यार, देखभाल और दया उस परिवार का आधार होगी। हर व्यक्ति दूसरे की खुशी पर ज्यादा ध्यान देगा और इस तरह सभी खुश रहेंगे।
बच्चों का पालन-पोषण परिवार का सबसे मुख्य और महत्वपूर्ण काम माना जाएगा और किसी को भी बच्चों की परवरिश की राह में आने की इजाजत नहीं होगी। एक मनुष्य का इस तरह से पालन-पोषण करना कि उसे खुद पर गर्व करने योग्य बनाया जा सके, वह समाज का जिम्मेदार नागरिक हो, अपनी क्षमताओं से भलीभांति वाकिफ हो, यह पति-पत्नी दोनों का सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र दायित्व होगा और दोनों इस काम के लिए समान रूप से समर्पित होंगे।
जैसे-जैसे इस बात की अधिकाधिक अनुभूति होगी कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य उन्नति और आत्मबोध है, धन, सत्ता और यश जैसी भौतिक उपलब्धियों की बजाय परिवार ही लोगों के लिए सर्वप्रमुख होंगे। मिट्टी और कंकड़, जिस पर हम कदम रखते हैं, जो पानी हम पीते हैं, हमारे चारों ओर जो वृक्ष घिरे हुए हैं और संसार के सभी कीट, पक्षी और पशु, ये सभी ईश्वर के मातृत्व और पितृत्व की छाया में हमारे भाई-बहन हैं।
भारत में यह अवधारणा वसुधव कुटुंबकम (पूरा विश्व एक परिवार है) के नाम से प्रचलित है। यद्यपि यह श्रेष्ठ अवधारणा हमने अभी तक पूर्णत: आत्मसात नहीं की है, लेकिन जिस तरह परिवार से इतर लोगों के साथ भी हमारे संबंध होते हैं, उसमें इस कुटुंबकम का एक नन्हा सा बीज तो नजर आता है। हर कोई भाईसाहब या बहनजी होता है। गुजराती में तो कोई सिर्फ आशीष या अनीता नहीं होता, बल्कि आशीष भाई और अनिता बेन होता है। दूसरों को अपने परिवार का हिस्सा बना लेने की इस ताकत में कितना सौंदर्य है।
भारत में पारंपरिक रूप से भी परिवार सबसे महत्वपूर्ण संस्था रही है। परिवार हमारी सबसे गहरी खुशियों, अंतरंगता और जीवन को बदल देने वाले अर्थपूर्ण पलों का केंद्र रहे हैं। भारत में अब भी काफी हद तक परिवार की पवित्रता बरकरार है।
भारत जैसे गरीब देश में लोग परिवार के सहयोग और ताकत के दम पर ही जीते और अपनी मुश्किलों से उबरते हैं। जब परिवार का कोई सदस्य बीमार पड़ जाता है तो भाई, बहन और बच्चे उसकी सेवा में जुट जाते हैं। अगर किसी की नौकरी चली जाती है तो पूरा परिवार उसकी मदद करने के लिए इकट्ठा हो जाता है। उसकी जिम्मेदारी उठाने और उसे दूसरी नौकरी ढूंढ़ने में मदद करता है।
मैं अमेरिका में आर्थिक मंदी के बारे में पढ़ रही थी कि वहां मध्यवर्गीय लोग सड़कों पर आ गए क्योंकि वे अपने घरों का कर्ज नहीं चुका सके। भारत में तो मैं ऐसी स्थिति की कल्पना भी नहीं कर सकती, क्योंकि यहां परिवार ही इसकी इजाजत नहीं देंगे। हमारे घर भले छोटे हों, लेकिन हमारे दिल बड़े हैं।
इन सबके बावजूद हमारी अपनी खामियां भी हैं और हमारे परिवार कोई आदर्श नहीं हैं। हमें अपने परिवार को चलताऊ ढंग से लेना बंद करना चाहिए और उसे ज्यादा ध्यान और तवज्जो देनी चाहिए। पिता और पति को अपने बच्चों और पत्नी के लिए, उनकी इच्छाओं, डर और सपनों को समझने के लिए समय निकालना चाहिए। अगर हम ऐसा कर पाते हैं तो हमें अपनी सच्ची खुशियों और समृद्धि का रास्ता जरूर मिल जाएगा। -लेखिक लाइफ पॉजिटिव की संपादक हैं।