रोबोट्स हैं ना
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रोबोट्स हैं ना

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घर, अस्पताल, युद्ध के मैदान, कार चलाने के लिए और बुजुर्गो के साथी बन चुकने के बाद अब रोबोट रैंप पर मॉडलिंग करते हुए भी नजर आ रहे हैं। देखा जाए तो हमारी जिंदगी से जुड़े कई पहलुओं को संभालने के लिए रोबोट्स का पदार्पण हो चुका है। जानिए कि आने वाले समय मंे यह कहां-कहां और क्या-कुछ कर पाएंगे।

सुपर मॉडल रोबोट्स

फैक्ट्री में काम करने और सरहद पर तैनाती के बाद कई मोर्चो पर मानव को पीछे धकेलने वाले रोबोट अब रैंप पर कैटवॉक करते हुए डिजाइनर कलेक्शन भी दिखाएंगे। संभव है कि आने वाले समय में रैंप पर जलवे बिखेरती मॉडल्स के बाद अब डिजाइनर्स अपने कलेक्शन को दिखाने के लिए मॉडल रोबोट्स का सहारा लेते दिखें।दुनिया के पहले रोबोट सुपरमॉडल रोबोट का नाम एचआरपी-4सी है। हाल ही में आयोजित हुए टोक्यो फैशन वीक में इसे पहली बार प्रदर्शित किया गया। तकरीबन 95 पाउंड वजनी और 5 फीट लंबा मॉडल रोबोट किसी 20 वर्षीय जापानी मॉडल जैसा है।

इसे रैंप पर सही तरह से चलाने के लिए 30 मोटर लगाई गई हैं। जापान के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस इंडस्ट्रियल साइंस का कहना है कि रैंप पर से मॉडल्स को पूरी तरह से हटाकर सिर्फ रोबोटिक मॉडल को चलाने में अभी तकरीबन 20 वर्ष का समय और लग सकता है।

इसके सिर में कुछ और मोटर जोड़ने के बाद इसके चेहरे पर भाव भी आ जाएंगे और यह बोलने भी लगेगा। फिलहाल शुरुआती मॉडल बनाने में ही एक रोबोट पर तकरीबन 2 लाख डॉलर का खर्च आएगा।

युद्ध क्षेत्र में भी मौजूद

इराक जैसे संवदेनशील देश में बमों को निष्क्रिय करते पैकबोट्स, रिमोट कंट्रोल नियंत्रित तलवारें, रोबोट द्वारा शूट करने वाली राइफल/रॉकेट लांचर और मानव रहित ड्रोन विमान के बाद अब रोबोट युद्ध क्षेत्र में भी दुश्मन को परास्त करते नजर आएंगे।इनकी सबसे बड़ी खासियत होगी कि यह तोप/बंदूक चलाने, देखने और मार करने का काम हमसे ज्यादा जल्दी कर पाएंगे। एक और न भूलने वाली बात यह कि रोबोट मानव की तरह थकेंगे नहीं।

भारत में भी मौजूद

शंकराचार्य इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों ने एक ऐसा आईपी रोबोट डिजाइन किया है जो ऐसी जगहों पर काम करेगा, जहां मनुष्य का पहुंचना मुश्किल है। इतना ही नहीं यह रोबोट उस जगह की चाही गई सारी जानकारी भी नेट के जरिए देगा।

इस रोबोट को बनाने वालों का दावा है कि इसे अंतरिक्ष में भेजकर वहां की जानकारी ली जा सकती है। इंटरनेट से कंट्रोल होने वाला यह आईपी रोबोट देश-विदेश के किसी भी कोने में काम कर सकेगा। इसमें एक ऐसा सॉफ्टवेयर लगाया गया है जिससे यह बिना इंटरनेट के करीब आधा किमी. की रेंज में काम कर सकेगा।

इसका संेसर रास्ते में आने वाली रुकावटों को पहचानकर नया रास्ता खोज लेगा। इसमें बैटरी बैकअप की भी व्यवस्था है ताकि यह लंबे समय तक चलता रहे। मात्र आठ इंच का होने की वजह से यह दुर्गम स्थानों में भी पहुंचकर काम कर सकेगा।

मेडिकल टूरिज्म

मेडिकल टूरिज्म के लिए मशहूर एक थाई हॉस्पिटल ने अपने यहां काम की दक्षता बढ़ाने और गलतियां कम करने के लिए रोबोट्स की उपयोगिता बढ़ाई है। यहां पिली पिकर नाम के रोबोट का काम सही दवाएं चुनने का है जबकि बॉक्स पिकर इससे आगे का काम करता है।

इससे अस्पताल का लेबर पर कम खर्च होता है, कम वक्त जाया होता है और गलती की भी संभावना नहीं रहती। लंदन के एक अस्पताल में तो रोबोट्स को बाकायदा वॉर्ड में राउंड लेने के लिए तैयार किया जा रहा है।

केमिकल रोबोट्स

सॉफ्टवेर या प्रोसेसर में जानकारी देने के बजाए इन रोबोट्स की केमिस्ट्री इनमें मौजूद पदार्थो पर निर्भर करेगी। इन्हें ष्द्धoड्ढoह्लह्य नाम दिया गया है। यह एक तरह की जैली से बना है। इसे बनाने वालों का दावा है कि इसे सूक्ष्म से सूक्ष्म जगहों तक पहुंचा सकते हैं।

शोबोट्स के निर्माताओं का मानना है कि यह मेडिकल के क्षेत्र में ज्यादा इस्तेमाल होगा। पानी की सफाई करने में भी यह फायदेमंद साबित हो सकता है।

रोबोट ने पढ़ाया भी

जापान में साया नाम के रोबोट का प्रमोशन हुआ है, अब वह रिसेप्शनिस्ट से ग्रामर का शिक्षक बन गया है। साया का काम बाकायदा सवालों के जवाब देने का है। इसके लिए उसके पास तकरीबन 700 शब्द और 300 मुहावरों का खजाना है।

यह बाकायदा हर बच्चे को नाम से बुलाता भी है। साया फिलहाल टोक्यो के एक स्कूल में पांचवी कक्षा के बच्चों के बीच उत्सुक्ता का विषय है। यह बता दें कि साया को कंट्रोल करने के लिए एक शिक्षक की जरूरत होती है।

म्यूल-बहुउपयोगी तकनीक

अमेरिकी सेना की बहुउपयोगी गाड़ी रूरुश्व की सबसे बड़ी खासियत है कि यह मानव रहित है। किसी भी जगह बैठकर ऑपरेट करने के लिए इसे जीपीएस यानी ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम से जोड़ा गया है। जीपीएस से जोड़ने के कारण यह कहीं से भी मिल रहे संदेशों पर अमल करता है, जबकि किसी जमीनी तकनीक में यह संभव नहीं है।

इसमें रडार तकनीक डाली गई है जो इस गाड़ी के चारों तरफ थ्री डी नजारा पेश करती है। जहां दूसरी तकनीक को सुधारने में लंबा वक्त और उपकरण लगते हैं, वहीं रूरुश्व कुछ एक औजारों से ही दुरुस्त किया जा सकता है। यह पूरी सेना के लिए आदेश जारी करने का एक माध्यम भी है।

विशेषज्ञ की सलाह

यूनिवर्सिटी ऑफ शेफील्ड के रोबोट विशेषज्ञ हिदायत दे रहे हैं कि रोबोट्स मनुष्य के लिए खतरा भी बन रहे हैं। संभव है कि आतंकवाद के बढ़ते कदमों के बीच आने वाले समय में यह आत्मघाती बमों की जगह ले लें।

मानव को बदलकर रोबोट्स से कार्य करवाने के मामले में अमेरिका सबसे आगे है, 2010 तक यहां मानव रहित सिस्टम तकनीक पर तकरीबन 24 बिलियन डॉलर खर्च किए जाने की उम्मीद है। इसके अलावा कनाडा, दक्षिण कोरिया, दक्षिण अफ्रीका, सिंगापुर, इजराइल, चीन, रूस और भारत भी इस तरह के प्रोजेक्ट्स में काफी दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

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