नई दिल्ली. मनमोहन सिंह की नई सरकार को अब आपराधिक मामलों का सामना कर रहे नेताओं वाले सहयोगी दलों के समर्थन की जरूरत नहीं होगी। ऐसे में लंबे समय से जरूरी न्यायिक सुधार और कानून लागू करने वाली एजेंसियों में पारदर्शीता व स्वायत्तता के काम को हाथ में लिया जा सकता है।
इन एजेंसियों पर प्राय: ये आरोप लगते रहते हैं कि इनका दुरुपयोग दागी नेताओं को बचाने अथवा सत्तारूढ़ दल की कृपा गंवाने वालों को परेशान करने के लिए किया जाता है।
मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री पद पर पहले कार्यकाल में जोर देकर कानून लागू करने वाली एजेंसियों व विधि मंत्रालय सहित संपूर्ण न्यायिक व्यवस्था में ईमानदारी, पारदर्शीता और जवाबदेही लाने पर जोर दिया था। विधि मंत्रालय ही विधि अधिकारियों की नियुक्ति करता है व इसकी प्रक्रिया में संशोधन की जरूरत है।
नई सरकार से अपनी उम्मीद जाहिर करते हुए पूर्व एटार्नी जनरल सोली सोराबजी साफ कहते हैं, ‘कृपया विधि अधिकारियों को बदलें। वे कई बार तो कोर्ट में भी नहीं आते।’ हालांकि एटार्नी उन्होंने जनरल मिलन बनर्जी जैसे विधि अधिकारियों की दक्षता को लेकर कुछ नहीं कहा।
2004 से सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की पड़ताल करने पर पता चला कि यूपीए सरकार के कार्यकाल में सिर्फ दो बार ही बनर्जी ने अदालती बहस में भाग लिया। एक मामला कर्मचारी राज्य बीमा कानून का था और दूसरा मामला राष्ट्रगान से ‘सिंध’ शब्द हटाने संबंधी था।
हालांकि केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले एटार्नी जनरल के रूप में उनका नाम 10 मामलों में उल्लेखित है। उन्होंने ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने के संवैधानिक मामले में भी पैरवी नहीं की। केंद्र की ओर से इस मामले में पूर्व एटार्नी जनरल के. पारासरन उपस्थित हुए थे।
वे वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर के मामले में भी नहीं आए। नैयर ने राज्यसभा में किसी राज्य विशेष से प्रवेश चाहने वालों के लिए स्थायी पते संबंधी उपधारा को अनिवार्य बनाने के लिए निर्देश मांगे थे। अब समय आ गया है कि कानून व विधि व्यवस्था को करोड़ों याचिकाकर्ताओं की अपेक्षाओं के अनुरूप संवेदनशील बनाया जाए।