Manoranjan
Aap Ki Baat Aap Ki Baat
सीने कहा है कि ‘मैं जब इस दुनिया में आया, तो इसे देखकर इस क़दर हैरान हो गया कि कई साल तक ठीक से बोल भी नहीं पाया’। हम सबकी भी तो वही कहानी है। इस दुनिया में आंख खुलने के बाद कितने दिन तक घर की दीवारों, मां-बाप के चेहरे, भाई-बहनों की गोद, पड़ोसियों का प्यार, सब कुछ हैरत से देखते ही रहे। संगीत की दुनिया भी इससे कुछ ज्यादा अलग नहीं है। मेरे अनुभव से इसमें एक अंतर इतना जरूर है कि इस दुनिया में हैरत का सिलसिला कभी ख़त्म नहीं होता। और हां, जब बोलने की बारी आती है, तो सिर्फ़ वाह! वाह! की आवाज ही निकलती है।
गले से जादू का खेल ईजाद करती आवाज के साथ बारी-बारी जब अलग-अलग साथ बजते हैं, तो दिल कह उठता है- हाय, मैं मर जाऊं! इस स्थिति का कमाल यह है कि हाय, मैं मर जाऊं! कहने वाली घड़ी में ही कहने वाला असल में जमीन से कुछ ऊपर उठ चुका होता है। यह इस जहान और आसमान के बीच की उड़ान का पहला क़दम है। वो चाहे साथ हो या कि आवाज, सच्चे सुरों में इतनी ताक़त होती है कि वह इंसान को दुनिया की हल्की बातों के बोझ से आजाद कर ऊंचा उठा देती है।
आपको कभी हैरत नहीं होती कि बांस का एक टुकड़ा, अपने सीने में छेद होते हुए भी कैसी मिठास फैलाता है? मुझे तो होती है। बहुत हैरत होती है, जब देखता हूं कि तार के छोटे-छोटे टुकड़ों को अलग-अलग तरह की लकड़ी पर कस दो, तो कितनी तरह की और कैसी-कैसी गूंज पैदा हो जाती है। और गूंज भी ऐसी कि दो-चार घड़ी को साज पर बजे और उम्र भर को दिल में गूंजती ही रहे। उस्ताद लोग अपनी फूंक और उंगलियों के बीच क्या तालमेल बिठाते हैं कि फूंक कभी शहनाई की गूंज बन जाती है, कभी ट्रम्पेट की आवाज, कभी सेक्सोफोन की पुकार, तो कभी क्लारनेट की लहर।
एक दिलकश साज और है, जो फ़िजाओं में मौजूद हवा को अपने अंदर खींचकर उसे संगीत में बदल देता है। उसे हम कहते हैं अकार्डियन। प्यानो अकार्डियन। आपको याद होगा कि हम लोग हारमोनियम के बारे में काफ़ी पहले बात कर चुके हैं। आज क्यों न अकार्डियन और उसके उस्तादों की बात की जाए। सबसे पहले तो यह बता दूं कि अकार्डियन एक विदेशी साज है। इसका मूल यूरोप में जर्मनी और इटली को माना जाता है, लेकिन अपनी इठलाती हुई चाल और शोखियों से भरी आवाज की वजह से दुनिया भर की लाडली बन गई।
हिंदी फिल्म संगीत में इसकी शुरुआत का सेहरा बतौर संगीतकार तो सी.रामचंद्र के सर जाता है, मगर उनको प्रेरित करने और फिर उसे उनके संगीत में बजाने का श्रेय जाता है गुडी सरवई को। क्या उस्ताद आदमी था यह गुडी सरवई। इस एक आदमी ने फुकनी की तरह सिकुड़ती-फैलती अकार्डियन से कैसी-कैसी जादू भरी आवाजों निकलवाई हैं कि यह फुकनी भी मौक़ा लगते ही आईने के सामने खड़े होकर हैरान होती होगी- ‘मैं? .. मैं ऐसा जादू कर सकती हूं?’ गुडी सरवई की कहानी तो जरा आगे बताऊंगा, पहले आपको बताता हूं कैसे इस ‘गुड मैन’ ने हिंदी फिल्म संगीत को एक नया साज दिया।
गुडी सरवई उस जमाने में बंबई के होटलों में अपने बैंड के साथ अकार्डियन बजाते थे। संगीतकार सी. रामचंद्र ने उन्हें सुना और पहली बार फिल्म ‘समाधि’ (1950) के गीत ‘ओ गोरे-गोरे, ओ बांके छोरे, कभी मेरी गली आया करो’ में लता मंगेशकर और अमीरबाई करनाटकी की ख़ूबसूरत आवाजों के साथ जो साथ बहुत प्रमुखता से सुनाई देते हैं, उनमें से एक है क्लारनेट और दूसरा अकार्डियन। यह गुडी सरवई का ही बजाया हुआ है। इस गीत ने आज से 60 साल पहले कैसी धूम मचाई होगी, इसका अंदाजा आप इसी से लगा लें कि तीन पीड़ियों के सफ़र के बाद आज भी यह गीत बेहद मशहूर है।
इसका कुछ श्रेय मैं इस गीत के गीतकार राजेंद्र कृष्ण को भी देता हूं, मगर गुडी का गुडमगुड अकार्डियन तो ऐसा चला कि बस चला ही चला। अच्छा, लगे हाथ एक बात और साफ़ करता चलूं, 1949 में रिलीज हुई राजकपूर की फिल्म ‘बरसात’ के दो गीतों ‘छोड़ गए बालम’ और ‘पतली कमर है’ को लेकर अक्सर यह ग़लफ़हमी हो जाती है कि इनमें बजने वाला वाद्य अकार्डियन है। हक़ीक़त यह है कि इन गीतों में हारमोनियम का इस्तेमाल हुआ है। इसे बजाने वाले वी. बलसारा साहब ने इसे ऐसी ख़ूबसूरती और हुनर के साथ बजाया है कि अकार्डियन का भरम हो जाता है।
ख़ैर, अब गुडी सरवई के ही बजाए कुछ और महान गीत याद दिलाऊं। सबसे पहले शंकर जयकिशन के साथ के गीत ‘आवारा हूं.. आवारा हूं’ (आवारा), ‘आ जा सनम मधुर चांदनी में हम’ (चोरी-चोरी), ‘मुझको यारो माफ़ करना’ (मैं नशे में हूं), ‘सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी’ (अनाड़ी), ‘अंधे जहान के अंधे रास्ते’ (पतिता)।
सुन लिया आपने ठीक से। अब जरा देखिए ‘आवारा हूं’। मुकेश की इस घोषणा के बाद ऐसा लगता है, जैसे अकार्डियन कहती है। ‘प्यूं-प्यूं, प्यूं, प्यूं-प्यूं’, ऐसा लगता है, जैसे अकार्डियन नायक की तरफ़ से जीभ बाहर निकालकर दुनिया को चिड़ा रही हो। कर लो जो करना है, अपन तो ऐसे ही हैं। फिर देखिए, ‘चोरी-चोरी’ का ‘आ जा सनम मधुर चांदनी में हम तुम मिलें तो वीराने में भी आ जाएगी बहार’। अब जरा यहां अकार्डियन की अदा देखिए। ऐसा लगता है, जैसे दो मोहब्बत करने वालों की ऐसी प्यार भरी बातें सुनकर पंछी, पेड़-पौधे और हवाएं एक साथ झूम रही हों।
मुझे तो अकार्डियन पीस में सुनाई देने लगता है- ‘झूमती फिरूं, झूमती फिरूं.. हूं.. हुं.. हुं.. हूं’। देखा आपने, मैं ख़ुद भी ऐसा झूमने लगता हूं कि इस बात का ़ख्याल ही नहीं रहता कि भैया इतना फैलने की गुंजाइश कहां है। चलो थोड़े में समेटता हूं। ओ.पी. नैयर के साथ फिल्म ‘आर-पार’ में ‘बाबूजी धीरे चलना, प्यार में जरा संभलना’ और ‘हूं अभी मैं जवां ए दिल’, सलिल चौधरी के साथ फिल्म ‘माया’ का ‘तस्वीर तेरी दिल में जिस दिन से उतारी है’। यूं तो लिस्ट बहुत लंबी है और आपको ख़ुद-ब-ख़ुद ढेरों गीत याद भी आ जाएंगे, मगर एक उल्लेखनीय बात जरूर कहूंगा।
वह है फिल्म ‘जादू’ और ‘दास्तान’ में नौशाद के साथ गुडी का अद्भुत अकार्डियन। ‘जब नैन मिले नैनों से और दिल पे न रहे काबू, तो समझो चल गया प्यार का जादू’। और ‘लो प्यार की हो गई जीत, बलम हम तेरे हो गए’।
गुडी के बाद केरसी लार्ड और सुमित मित्रा ने अद्भुत काम किया। केरसी लार्ड ने भी ऐसा काम किया है कि तबीयत फड़क जाती है। ‘मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू’ और ‘रूप तेरा मस्ताना’ (आराधना),‘रात अकेली है, बुझ गए दिए’ (ज्वैल थीफ), ‘चूड़ी नहीं ये मेरा दिल है’ (गैंबलर)।
अच्छा आपको राज कपूर की फिल्म ‘संगम’ का यह गीत तो ख़ूब याद होगा- ‘हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गाएगा’। इस गाने में राज साहब अकार्डियन बजाते हुए गा रहे हैं। मौक़ा लगे तो इस गाने को दुबारा देख लें। दो बातें समझ में आ जाएंगी- एक तो यह कि अकार्डियन बजता कैसे है और दूसरे यह कि राज कपूर इस साज़ से कितनी मोहब्बत करते थे। उनका चेहरा हर बात कह जाता है।
अब एक बात इस बारे में मैं बताऊंगा। वह यह है कि इस गीत के लिए अकार्डियन बजाने वाले का नाम है-सुमित मित्रा। इस गीत में मित्रा ने इतना ख़ूबसूरत काम दिखाया कि इसके बाद की शंकर-जयकिशन की सारी फिल्मों में इन्हीं का अकार्डियन बजा है। वैसे अगर आप गुडी सरवई को देखना चाहें, तो फिल्म ‘आवारा’ के ‘एक बेवफ़ा से प्यार किया’ में अकार्डियन बजाते हुए देख सकते हैं।
केरसी और मित्रा इतने गुणी संगीतकार हैं कि इतने-से में काम नहीं चलेगा। भगवान के फ़ज़ल से दोनों अभी हयात हैं। काम कर रहे हैं। इनके काम के बारे में एक बार अलग से बात करेंगे। अभी तो गुडी सरवई की तरफ लौट चलें।
मिस्टर म्यूजिक : 1913 में पैदा हुए संगीत के इस जीनियस गुडी सरवई का कमाल यह था कि अपनी कमसिनी की उम्र में ही संगीत के सच्चे उस्ताद साबित हो रहे थे। अकार्डियन के साथ शायद ही कोई ऐसा साज़ हो, जो गुडी न बजाते हों। हारमोनियम, तबला और हिंदुस्तानी सुगम संगीत गायन से शुरू होकर विख्यात संगीतकार ज़ुबीन मेहता के पिता मेहिल मेहता के उस दौर के प्रसिद्ध बॉम्बे सिम्फनी आर्केस्ट्रा में वायलिन बजाने लगे। लेकिन दिल तो अकार्डियन से जुड़ा था, सो बस। अकार्डियन लेकर ही 30 के दशक में नाम कमाया। शहर के होटल, क्लब, शादी-ब्याह से चलकर उस दौर के मशहूर मैजेस्टिक होटल और फिर ताज होटल में आदी मर्ज़बान के मशहूर वैराइटी शोज़ का हिस्सा बनकर धूम मचाते रहे।
1942 में अपना बैंड बनाकर संगीत में नए-नए प्रयोग शुरू कर दिए। धीरे-धीरे उसके एक से चार बैंड बन गए। 40 और 50 के दौर में बॉम्बे की नौजवान पीढ़ी गुडी के मादक और मोहक संगीत पर झूम रही थी। उसकी वजह से ही होटलों में भीड़ जुटने लगी थी। 15 रुपए की फीस से शुरू होकर, हर शो के 2500 रुपए तकफीस हासिल की।
16 जनवरी 1978 को इस महान संगीतकर को बेसुरी मौत अपने साथ ले गई। मरने से पहले अपने बिस्तर पर लेटा यह संगीत योद्धा हारा नहीं था। नसों में चुभी हुई सुइयों के साथ ही हवा में किसी ख्याली अकार्डियन पर अपनी जादुई उंगलियां चलाता और पास बैठी बेटी सिलू से कहता- ‘ताज में शो का व़क्त हो गया है..मुझे देर हो रही है’। एक दिन बेटी से अपना एक पसंदीदा गीत सुनते-सुनते इस महान वादक ने दुनिया से आंखें मूंद लीं।
और .. मुझे अफसोस है कि मैं गुडी सरवई से कभी नहीं मिल पाया, मगर एक बात का फ़º है कि गुडी सरवई का वह अकार्डियन, जिसे उन्होंने ‘आवारा हूं’ के लिए बजाया था, अब मेरे दोस्त जगदीश श्रीवास्तव (उज्जैन) के पास है। जगदीश भाई और भोपाल के हरीश वर्मा, दोनों गहरे दोस्त भी हैं और दोनों ही अकार्डियन के उस्ताद भी। जब दोनों एक साथ अकार्डियन पर अपनी उंगलियां घुमाते हैं, तो मैं मंत्र मुग्ध-सा आंखें बंद कर लेता हूं। मुझे उस घड़ी गुडी सरवई का मुस्कराता हुआ चेहरा दिखाई देता है।
इस समय मेरे कानों में अकार्डियन की आवाज़ गूंजने लगी है। अब नहीं रुकूंगा। मैं चला खोजने उस मधुर चांदनी में शायद कुछ मिले। आख़िर अगले हफ्ते भी तो होगी न अपनी आपस की बात। सो जय-जय।