तो क्या अब देर हो गई?
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तो क्या अब देर हो गई?

इस्माइलपुर (यमुनानगर)। गांव इस्माइलपुर में पिछड़े वर्ग के दो समुदायों की संख्या अधिक है। बात 2006 की है। एक समुदाय के लोग दूसरे समुदाय की लड़की का ब्याह नहीं होने दे रहे थे। दूसरे पक्ष ने इसका विरोध किया तो विवाद शुरू हो गया।

इसके बाद पहले पक्ष ने दूसरे पक्ष के कुछ युवकों को पीटा तो जवाब में दूसरे पक्ष ने भी हमला कर दिया। पूरे मामले में पुलिस का रवैया सकारात्मक नहीं रहा। बजाए मामला सुलझाने के पुलिस ने दोनों पक्षों के पांच-पांच लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

जनता और प्रशासन के बीच इसी खाई को देखते हुए माओवादी विचारधारा के समर्थकों को यहां पांव फैलाने का मौका मिल गया। अब यहां के गांव मार्क्‍सवादी गढ़ में तब्दील हो गए हैं। यदि प्रशासन ने लोगों के झगड़े में तत्परता दिखाई होती तो शायद गांव वाले आज संभवत: अमन चैन से रहते।

अजीब का सन्नाटा है यहां। गांवों के दोनों वर्र्गो में जबरदस्त अविश्वास है। आलम यह है कि शाम ढलते ही एक समुदाय दूसरे समुदाय की गली के पास से गुजरने की हिम्मत नहीं करता।

ये वही गांव हैं जिनमें एक समुदाय पर माओवादी होने का आरोप है। कुछ युवक फरार हैं। यहां की चौपाल में अक्सर नेपाल, आंध्र प्रदेश और झारखंड की चर्चा होती है। इस सोच वाला यह अकेला गांव नहीं है। करीब डेढ़ दर्जन गांवों की हालत कमोबेश यही है।

चाहे वह भूड, टपरी, देवधर, जयधरी, बहादुरपुर, टापू माजरी या कोई और गांव हो। पहले समुदाय के लोगों की माने तो गांव के दूसरे समुदाय के युवाओं को रात के वक्त नदी में हथियार चलाने और गुरिल्ला युद्ध के गुर सिखाए गए हैं।

गांव की महिला सरपंच के पति नरेंद्र ने बताया कि कुछ लड़के और लड़कियां बाहर से आकर गांव के समुदाय विशेष के युवाओं को प्रशिक्षण देते थे। गांव के नरेंद्र विकास चौधरी ने बताया कि शुरू में उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने मार्क्‍सवादियों ने अपने पांव पसार लिए।

दूसरे समुदाय के नंबरदार हरिमल नंबरदार का कहना है कि वे माओवादी नहीं हैं। पुलिस और गांव के दबंग लोगों ने माओवादी विचारधारा अपनाने को विवश किया।

हरिमल का पोता रिंकू भी माओवादी गतिविधियों में नामजद है और फरार चल रहा है। 70 वर्षीय हरिमल ने बताया कि युवा पीढ़ी सम्मान से जीना चाहती है। दबंगों को यह बात मंजूर नहीं है।



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