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Chhattisgarh
Bilaspur Bilaspur बिलासपुर. आचार संहित हटते ही वन विभाग की तिजोरी भरने का सिलसिला शुरू हो गया है। विभाग को सबसे अधिक राशि लकड़ियों की नीलामी से मिलती है। विधानसभा चुनाव से पहले लगी आचार संहिता की वजह से लकड़ी की नीलामी का काम रुका हुआ था। वन विभाग ने इससे पहले फरवरी माह में लकड़ियों की नीलामी की थी।
इसके बाद से कोई नीलामी नहीं हो सकी। नतीजतन बिलासपुर वृत्त के कोटा, पेंड्रा के मढ़ना, कटघोरा के कसनियां एवं रायगढ़ के उदरना डिपो में बड़ी तादात में इमारती लकड़ियां इकट्ठी हो गई थीं। उनकी नीलामी होना शेष थी। आचार संहिता की वजह से राज्य सहित आसपास के राज्यों से नीलामी में आने वाले टिंबर व्यवसायी भी परेशान हो गए थे।
ज्यादातर टिंबर व्यवसायियों के गोदाम भी खाली होने लगे थे। ऐसे में आचार संहिता समाप्त होते ही वे लकड़ियों की नीलामी में बड़ी संख्या में पहुंच गए। आचार संहिता समाप्त होते ही वन विभाग ने नीलामी की प्रक्रिया शुरू की। सबसे पहली नीलामी 20 मई को मरवाही वन मंडल के पेंड्रा स्थित मढ़ना डिपो में हुई।
यहां पर मध्यप्रदेश एवं महाराष्ट्र के टिंबर व्यवसयी भी पहुंचे थे। मढ़ना में 1 करोड़ 70 लाख रुपए की लकड़ी नीलाम हुई। 21 मई को बिलासपुर वन मंडल के कोटा डिपो से 2 करोड़ 18 लाख रुपए की लकड़ी नीलाम हुई। 22 मई को कटघोरा के कसनिया डिपो में नीलामी की प्रक्रिया हुई वहां पर 2 करोड़ 72 लाख रुपए की लकड़ी बिकी।
इसी तरह से अब तक की सबसे बड़ी 3 करोड़ 31 लाख रुपए के लकड़ी की नीलामी रायगढ़ वन मंडल के उरदना डिपो में हुई शनिवार को हुई। रायगढ़ वन मंडल के उदरना डिपो में आयोजित नीलामी में बिलासपुर सहित, रायपुर एवं उड़ीसा के टिंबर व्यवसायी भी शामिल हुए।
रायगढ़ में साल वन ही अधिक हैं इसलिए यहां साल की लकड़ियों की अधिक पूछपरख हुई। चूंकि नीलामी बड़ी थी और व्यापारी भी बड़े थे इसलिए पहली नीलामी का आंकड़ा 3 करोड़ 31 लाख रुपए पहुंचा है। पूरे वृत्त में नीलामी का आफसेट प्राइज 8 करोड़ के लगभग था। नीलामी में विभाग को 10 करोड़ रुपए का राजस्व मिलेगा।
नीलामी के लिए डिपो में साल, सागौन, साजा, तिलसा, बीजा सहित अन्य सभी प्रजातियों की लकड़ियां थी। चार माह बाद हुई नीलामी में सबसे ज्यादा 75 फीसदी साल की लकड़ी नीलाम हुई। दूर-दूर से आए टिंबर व्यवसासियों की मांग साल की लकड़ी ही रही।
अन्य सभी प्रकार की प्रजातियां शेष 25 फीसदी में शामिल रहीं। साल की डिमांड के साथ-साथ उसकी आफसेट प्राइज भी विगत कुछ सालों की तुलना में 30 फीसदी तक रही। जबकि आमतौर पर यह 10 से 12 फीसदी ही रहती है।