मुकुल शिवपुत्र के बाद गायकी का एक और बादशाह जीवन चलाने के लिए सवारियां इकट्ठी कर रहा है। संस्कृति के उन्नयन का दावा करने वाले देश में प्रतिभाओं के साथ ऐसा होगा किसी ने कल्पना नहीं की थी। हालांकि मुकुल शिवपुत्र को तो मध्य प्रदेश सरकार ने ख्याल गायकी केंद्र का प्रमुख बनाकर पुनर्वास की व्यवस्था कर दी, लेकिन अमरनाथ पर कब निगाहें उठेंगी इसका पता नहीं।
जालंधर.
कभी जिनका गाना सुनने के लिए लोग मीलों पैदल चलकर आते थे और एक झलक पाने के लिए घंटों खड़े रहते थे। आज वही कलाकार गुमशुदगी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। इनमें से कोई रिक्शा चला रहा है, तो कोई बस स्टैंड पर बसों के लिए सवारियां इकट्ठी करने के लिए आवाजें लगाता है।
कोई गांव में चौकीदारी कर अपने परिवार का पेट पाल रहा है। इन गायकों के हालात पर लेखक सवरण सिंह टहिणा ने किताब ‘सुरां दे वारिस’ लिखी है। इसको पढ़कर दैनिक भास्कर और रेडियो 94.3 माय एफएम ने इन गायकों की जिंदगी को सुखी बनाने के लिए चैरिटी इकट्ठी करने का बीड़ा उठाया है। यह चैरिटी इन गायकों को दी जाएगी। जानते हैं इन कलाकारों को
अमरनाथ तानसेन
फरीदकोट के बस स्टैंड पर लोगों को कोट, बरगाड़ी, मुद्दकी, तलवंडी बाईपास, मोगा, बाजाखाना, बठिंडा ले जाने के लिए आवाजें लगाता अमरनाथ तानसेन किसी जमाने में दोगाने का बेताज बादशाह हुआ करता था। अमरनाथ आज हेमकुंड बस सर्विस में अड्डा इंचार्ज की सेवाएं निभा रहा है।
गाने से आज भी उसका नाता कल सा है। जब क भी भी समय मिलता है तो अपने दोस्तों को गाना सुनाना शुरू कर देता है, लेकिन दो-तीन गानें सुनाने के बाद काउंटर पर खड़ी बस का ख्याल आता है और फिर सवारियां इकट्ठी करने के लिए आवाजें लगाने लगता है। बस स्टैंड पर सवारियां इकट्ठी करने वाला अमरनाथ तानसेन कभी मशहूर गायिका स्वर्ण लता के साथ स्टेज प्रोग्राम लगाता था। एचएमवी कंपनी के रिकार्ड पर उनके कई गीत रिकार्ड हुए। अमरनाथ को गायकी विरासत में मिली है।
उनके मामे रामप्रताप, लछमण दास व रामलाल शौकीया तौर पर गाते थे। अमरनाथ ने उनसे प्रभावित होकर गाना शुरू कर दिया। अमरनाथ के गाने का सफर फरीदकोट के राजा द्वारा कराए समागम के साथ हुआ। समागम में महोम्मद सदीक, राजिंदर राजन, हरचरन गरेवाल, स्वर्णलता व पम्मी पोहली जैसे नामवर गायक उपस्थित हुए।
अमरनाथ को उसके दोस्तों ने कहा कि बढ़िया मौका है तुम भी अपनी कला के जौहर दिखाओ, लेकिन अमरनाथ ने मना कर दिया। साथियों द्वारा स्टेज पर नाम बुलाए जाने के कारण अमरनाथ को स्टेज पर जाना पड़ा। उन्होंने साजी (साज बजाने वाले) जिंदों से कहा कि यह उनकी पहली स्टेज है, इसलिए मेरा साथ देना। जब अमरनाथ ने पहला गीत गाया तो लोगों ने दूसरे गाने की फरमाइश की। साजी ने बजाने से इनकार कर दिया क्योंकि वह स्वर्णलता के साजी थे।
अमरनाथ ने इकट्ठे हुए सभी पैसे उन्हें दे दिए तो उन्होंने बजाना स्वीकार किया। स्वर्णलता को जब इस बारे में पता चला तो उन्होंने अपने साजियों को डांटा और अमरनाथ की तारीफ करते हुए उन्हें लुधियाना में मिलने के लिए बुलाया। यहीं से अमरनाथ व स्वर्णलता की जोड़ी ने दो गाने शुरू किए। इसके बाद तानसेन व स्वर्णलता ने काफी स्टेज प्रोग्राम इकट्ठे किए। एचएमवी कंपनी ने उनका पहला तवा (ग्रामोफोन) 1975 में रिकार्ड किया।
इसके गाने ‘तूं ए मेरी चन्नी ते मैं तेरा चन्ना नीं, ‘कुल्फी दा की खाणा चूप लै गन्ना नी’, दूसरा गाना लम्मी दी की धम्मी गडणी, मेरी मदरो बुक्कल दा गहणा हिट हुए। इसके बाद उन्होंने बाबू सिंह मान द्वारा लिखे गीत मैनूं कहिंदा सूट नई पाउंदी, मैं पा लिया शरदई, जेठ दी नजर बुरी गोडियां परने पई भी हिट हुए। लता और तानसेन दोनों के 6 रिकॉर्ड मार्केट में आए जो काफी प्रसिद्ध हुए। दोनों ने कोलकाता व मुंबई में भी गाया। तानसेन ने नरिंदर बीबा, सुदेश कपूर, पम्मी पोहली के साथ भी गाया है।
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