यह है जल संकट का सच
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यह है जल संकट का सच

शिमला । शहर में हमेशा पानी के लिए चिक-चिक रहती है। नगर निगम का कहना है कि सामान्य दिनों में शहर की जरूरत पूरा करने के लिए करीब 35 एमएलडी यानी 3 करोड़ 50 लाख लीटर पानी की आवश्यकता है, जबकि पर्यटन सीजन में 42 एमएलडी (4 करोड़ 20 लाख लीटर) की, लेकिन यह सच नहीं हैं।

भास्कर ने जाना कि साल 2001 की जनगणना के मुताबिक शहर की आबादी 1 लाख 42 हजार 555 थी। उस समय शहर में वार्डे की संख्या 19 थी। 23 अगस्त 2006 को निगम परिधि में 6 और वार्ड मिलाए गए। इस तरह वर्तमान में वार्डे की संख्या 25 हो गई है और शहर की औसत आबादी इन दिनों करीब 2 लाख है।

आईपीएच नियमों के मुताबिक अर्बन एरिया में प्रति व्यक्ति 135 लीटर पानी चाहिए। इस लिहाज से 2 लाख आबादी के लिए रोजाना 29 एमएलडी (2 करोड़ 90 लाख लीटर) पानी की जरूरत है।

इसमें अगर पर्यटकों की संख्या की जोड़ा जाए तो शहर में रोजान करीब 25 हजार लोग घुमने आते हैं। इस तरह रोजाना 135 लीटर प्रति व्यक्ति के हिसाब से 33 लाख 75 हजार लीटर पानी और चाहिए। इस तरह नगर निगम को 3 करोड़ 3 लाख 75 हजार लीटर पानी की आवश्यकता है।

अब जरा अन्य पहलू पर भी गौर कर लें। शहर में करीब 35 सरकारी विभागों के अलावा तीन बड़े अस्तपाल व दर्जनों स्कूल है। जाहिर तौर पर यहां पानी की खपत ज्यादा रहती है।

इस लिहाज से यह मात्रा 145 लीटर प्रति व्यक्ति भी मानी जाए तब भी इतनी आबादी को रोजाना 3 करोड़ 23 लाख लीटर पानी की जरूरत है। वीरवार और शुक्रवार को छोड़ दिया जाए तो आईपीएच विभाग रोजाना करीब 38 एमएलडी (3 करोड़ 80 लाख) के आसपास पानी की आपूर्ति कर रहा है, बावजूद इसके कई क्षेत्रों में पानी की भारी किल्लत है।

ऐसा भी क्या: राशनिंग की स्थिति में लोगों को एक दिन छोड़ कर पानी दिया जाता है। यानी एक दिन में आधे क्षेत्र में ही पानी की सप्लाई छोड़ी जाती है। नगर निगम को गर्मियों में औसतन 3 करोड़ लीटर पानी मिलता है। यानी पानी की इतनी मात्रा एक लाख आबादी में बांटी जाती है।

रोजाना की यह 13.50 एमएलडी बनती है। फिर एक दिन छोड़कर भी लोगों को पर्याप्त पानी क्यों नहीं मिलता है। सवाल है कि जब रोजाना पानी देने पर सामान्य दिनों में 35 एमएलडी पानी से गुजारा होता है तो फिर राशनिंग के दिनों में 30 एमएलडी पानी आधे शहर में बांटने के बाद भी लोगों को पर्याप्त पानी क्यों नहीं मिलता।

डेड पड़े मीटर से नुकसान: पानी की किल्लत के लिए डेड मीटर भी बड़ा कारण है। शहर में 23 हजार 268 में से करीब 7500 मीटर खराब पड़े हैं। एवरेज बिल दिए जाने से उपभोक्ताओं को पता है कि जितना पानी बर्बाद कर लो बिल तो उतना ही आना है।

जानकारों का कहना है कि अगर मीटर सही हालत में होते तो लोग पानी की बर्बादी न करते। हर वार्ड में औसतन 300 मीटर डेड पड़े हैं। इससे नगर निगम को ही ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है।

कागजों में कमेटियां : पानी की चेकिंग के लिए कागजों में ही कमेटियों का गठन किया गया है। जल वितरण शाखा के अधिकारी लाल बती जला बंद कमरों में बैठकों में मशगूल रहते हैं। जिसका नतीजा जीरो रहता है। सवाल है कि अगर जल वितरण शाखा काम के प्रति ईमानदार है तो अब तक लीकेज की समस्या हल क्यों नहीं हुई।

लोग पानी के लिए इधर-उधर न भटकते। पानी की बर्बादी करने वाले लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाती। लागों का सवाल है कि पॉश एरिया में अधिकारी बताए कि पॉश एरिया में पानी की बर्बादी पर कितनों के खिलाफ कार्रवाई की गई और टंकियां ओवरफ्लो करने पर कितने कनेक्शन काटे गए और वार्ड के लिए गठित कमेटियां क्या काम कर रही हैं, जबकि असमान वितरण के कारण करीब 2 एमएलडी पानी बर्बाद हो जाता है।

लीकेज पर नहीं कंट्रोल: लीकेज कंट्रोल के तैयार मैकेनिज्म पूरी तरह से फेल रहा है। लीकेज रोकने के लिए कागजों में हर साल खर्च्े में लाखों रुपए की राशि दर्शाई जाती है लेकिन इसका रिजल्ट कुछ भी नहीं निकला। शहर में रोजाना करीब चार एमएलडी पानी बर्बाद होता है।

नाम न छापने की शर्त पर एक व्यक्ति ने बताया कि पानी को लेकर हुए खर्च की जानकारी आरटीआई के तहत ली जाएगी।

कंस्ट्रक्शन के लिए पानी का प्रयोग: शहर के अधिकांश एरिया में कंस्ट्रक्शन के लिए पीने का पानी प्रयोग किया जाता है। कई लोगों ने कंस्ट्रक्शन के तहत कनेक्शन लिए हैं, लेकिन गर्मियों में सभी तरह के कनेक्शनों पर रोक लगाई जाती है।

बावजूद इसके कंस्ट्रक्शन के लिए पानी का दुरूपयोग किया जाता है। सवाल है कि शिमला में अधिकांश क्षेत्रों में सड़कों की व्यवस्था न होने से गाड़ियां नहीं पहुंच पाती है। फिर भी इन क्षेत्रों में निर्माण हो रहा है। सवाल है कि पानी आ कहां से रहा है। सीम्रिटी, ढली, कसुम्पटी, पंथाघाटी, विकासनगर व फ्लावरडेल आदि क्षेत्रों में बेतहाशा भवन निर्माण हो रहे हैं।

स्टोरेज टैंकों की कमी: राशनिंग की एक बड़ा कारण नगर निगम के पास पर्याप्त स्टारेज टैंक न होना भी है। बारिश से पेयजल स्रोतों में जलस्तर बढ़ जाता है अगर स्टोरेज टैंकों की व्यवस्थ होती तो चौबिस घंटे पंपिंग कर पानी को स्टोरज किया जा सकता है, लेकिन ज्यादा पानी आने पर आगे आधा-आधा दिन तक पानी की सप्लाई बेकार छोड़ दी जाती है।

जिससे की पानी की बर्बादी होती है। जो पानी लोगों के पीने के काम आ सकता था उसको व्यर्थ नालियों में बहाया जाता है या फिर लीकेज के कारण सड़कों पर बहता रहता है। नगर निगम के पास बड़े स्टोरेज टैंकों के नाम पर संजौली, रिज व क्रैगनैंनों ही है। इन तीनों स्टोरेज टैंकों की क्षमता करीब 16 एमएलडी है।

ब्राॉक्हॉस्ट एरिया में पीडब्ल्यूडी के सरकारी आावास के पीछे बनी टंकियों से ओवरफ्लो होकर बर्बाद होता पानी कार्टरोड में नगर निगम की ब्रांच लाइनों से इस तरह लीक होता है सप्लाई का पानी न्यू शिमला में निगम की ब्रांच लाइन से लीक होकर जंगलों की सिंचाई के काम आता पानी छोटा शिमला में वाल्व होल से लीक होकर सड़क पर कुछ इस तरह बर्बाद हो रहा है पानी।



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