ग्लेशियर, झीलें मचा सकते हैं तबाही
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ग्लेशियर, झीलें मचा सकते हैं तबाही

पालमपुर। शांत हिमाचल के पहाड़ों पर ग्लेशियर झीलों के रूप में आफत का सामान तैयार होने लगा है। राज्य के ऊंचे पहाड़ों पर बनी हुई लगभग एक दर्जन ग्लेशियर झीलें कभी भी ग्लोबल वार्मिग के कारण फट सकती हैं। इनके फटने से निकले वाली अथाह जलराशि हिमाचल के निचले हिस्सों में बाढ़ के कारण तबाही का भयावह दृश्य बना सकती हैं।

घरों में चैन से सोए हुए लोग उफनती नदियों में समा सकते हैं और कुछ वर्ष पहले सतलुज से मचे तांडव से भी भयंकर तस्वीर सामने आ सकती है। पालमपुर कृषि विवि में जियो इंफॉर्मेटिक्स सेंटर में विशेषज्ञ वैज्ञानिकों ने अपने शोध में इस आश्य का खुलासा किया है।

इस रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने इन ग्लेशियल झीलों से बचाव के लिए एक मैकेनिज्म तैयार करने की भी संस्तुति की है। मगर अब तक राज्य सरकार की ओर से इस बारे में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। सेंटर की प्रभारी डॉ. शारदा सिंह ने इस शोध की पुष्टि करते हुए कहा है कि निश्चित रूप से ये ग्लेशियल झीलें हिमाचल में नदियों के माध्यम से एकाएक बढ़ने वाली जलराशि के कारण बड़ी तबाही मचा सकती हैं।

हिमाचल के पहाड़ों पर ग्लेशियर राज्य में पानी के सबसे बड़े स्रोत के रूप में स्थित हैं। इन्हीं ग्लेश्यिरों के पिघलने से कई जगहों पर ग्लेशियर झीलें बनी हुई हैं। ये झीलें हिमाचल में बहने वाली नदियों के मुहाने पर स्थित हैं। कृषि विवि के वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पहाड़ों पर ग्लेशियर ग्लोबल वार्मिग के कारण पिघल रहे हैं।

इनसे ही ग्लेशियल झीलें तैयार हो रही हैं। ये झीलें इनके बढ़ते साइज और हाइड्रोलिक प्रेशर के कारण फट जाती हैं जिससे एकाएक बाढ़ आने का खतरा बना रहता है। इनके अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने हिमाचल को पहले चार बेसिन में बांटा।

इनमें ब्यास, रावी, सतलुज और चिनाब आदि शामिल हैं। अध्ययन में पता चला है कि करीब ढाई हजार ग्लेशियर हिमाचल के इन बेसिन से जुडे हुए पहाड़ों पर बने हुए हैं। इससे करीब साढ़े चार हजार किलो वर्ग मीटर क्षेत्रफल कवर किया गया है।

जिसमें लगभग पौने चार सौ क्यूबिक किलोमीटर आइस रिजर्व स्थित है। इन ग्लेशियरों से कुल 156 झीलों को चिह्न्ति किया गया है जिसमें लगभग 375 वर्ग किलो मीटर का क्षेत्र दर्शाया गया है। शोध में नतीजा निकला है कि कुल 16 ग्लेशियर झीलें ऐसी हैं जिन्हें बेहद खतरनाक चिह्न्ति किया है। वैज्ञानिकों ने बचाव के तरीकों को भी रिपोर्ट में दर्शाया है।



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