नई दिल्ली. भाजपा के पितृ संगठन माने जाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हाल के आम चुनाव में हार के बाद पार्टी को मूल विचारधारा पर लौटने की सलाह दी है। हार के कारणों के तमाम विश्लेषणों के बाद संभावना यही है कि अगले माह होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी इसी पर मुहर लगाएगी। पार्टी की मूल विचारधारा हिंदुत्व की है।
मूल मुद्दों पर पार्टी के लौटने के साथ ही उस पर संघ की पकड़ और मजबूत होगी। भाजपा भी विचारधारा के स्तर पर अपने को संघ और संबद्ध संगठनों से अलग नहीं कर सकती। नए सरसंघचालक मोहन भागवत और सरकार्यवाह सुरेश भैय्या जोशी दोनों ही कट्टरपंथी लाइन पर चलने वाले हैं। नतीजतन संघ के उसूलों के प्रति ज्यादा निष्ठा और उसके मूल्यों का तेजी से प्रसार देखने को मिल सकता है।
भाजपा में एक वर्ग खुश नहीं
हालांकि भाजपा में ही एक वर्ग है जो हिंदुत्व की लाइन से नाखुश है और लोकसभा चुनाव में हार के लिए पार्टी की इसी छवि को दोषी मानता है। उसका मानना है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के उग्र चुनाव अभियान और वरुण गांधी के भड़काऊ भाषणों से ये छवि और मजबूत हुई है। इस वर्ग के नेताओं का मानना है कि चुनाव अभियान में सभी को शामिल करने वाला नजरिया और खुशहाल भविष्य का वादा होना चाहिए।
उनका कहना है कि भले मोदी विकास की बात करें लेकिन उनकी जो छवि है, उसके चलते वे बड़े वर्ग में अस्वीकार्य हैं और वही छवि उनकी विकास की बातों को पीछे धकेल देती है। संघ की पृष्ठभूमि वाले कुछ भाजपा नेता संघ द्वारा भाजपा में नियुक्त प्रतिनिधियों के हस्तक्षेप की भी आलोचना करते हैं। खासकर उप्र में जहां वे चुनाव अभियान की निगरानी की भूमिका में थे।
भाजपा और संघ में इस तरह के मतभेद कुछ समय से रहे हैं और संघ में इसको लेकर कुछ लोगों की नया राजनीतिक संगठन खड़ा करने की भी सोच रही है। लेकिन इसको बल नहीं मिल पाया है। भाजपा नेता भी मानते हैं कि पार्टी संघ से नाता तोड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकती।
संघ के मुखपत्र ‘आरगेनाइजर’ में दिए गए निर्देशों के मुताबिक, ‘हिंदुत्व की ओर लौटना होगा, गठबंधन की बातें बंद करनी होंगी और कमजोर प्रदेशों में संगठन को मजबूत बनाने व प्रचार-प्रसार की लंबी अवधि की रणनीति बनानी होगी।’ कहा गया है कि मीडिया पर निर्भरता ठीक नहीं है जो काफी हद तक कांग्रेस की ओर रुझान रखता है।