वायरल के लिए ‘वैकल्पिक’
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वायरल के लिए ‘वैकल्पिक’

शिमला. बाकी देश जब गर्मी में तप रहा है तो इस बार शिमला में भी मौसम के अलग तरह के रंग नजर आ रहे हैं। दिन में तेज गर्मी और फिर रात को ठंड या अगले दिन बारिश। मौसम के बार-बार के बदलाव से शहर में वायरल के मामले बढ़ गए हैं। आईजीएमसी सहित सभी अस्पतालों में हर दिन कुल 70 के करीब मरीज पहुंच रहे हैं। करीब हर दूसरे घर में परिवार का कोई न कोई सदस्य आंख, गले और पेट के संक्रमण से परेशान है।

एलोपैथी उपचार पद्धति में वायरल का कोई निश्चित इलाज नहीं है, लेकिन एक्सपर्ट कहते हैं कि आयुर्वेदिक नुस्खे इन बीमारियों से लड़ने की भरपूर शक्ति दे सकते हैं। ये नुस्खे इस मौसमी बदलाव में आपके इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाए रखने में काफी कारगार साबित होते हैं। इसके अलावा जो लोग होम्योपैथी पद्धति में विश्वास रखते हैं उनके लिए इस पद्धति में भी बेहतर उपचार मौजूद हैं।

आयुर्वेद में बेहतर इलाज : मौसम के बदलाव से होने वाले इन रोगों से बचने के लिए आयुर्वेद्ध पद्धति में नियमित उपचार के साथ घरेलु नुस्खों को महत्व दिया गया है। आयुर्वेद में गले में संक्रमण के लिए चंद्रअमृत रस, कफ केतु रस और वायरल फीवर में त्रिभुवन केसरी रस दवाओं को अच्छा माना गया है।

डॉक्टर की सलाह से इन्हें आप ले सकते हैं। इसके अलावा आयुर्वेद में घरेलु नुस्खों के प्रयोग से तंदुरस्त रहा जा सकता है। क्षेत्रीय आयुर्वेद अस्पताल के डॉ. केके शर्मा का कहना है कि अदरक और शहद को मिलाकर सेवन करने से गले का रोग हट जाता है। वायरल बुखार तुलसी का रस और वटी का दिन में तीन बार सेवन करने से राहत मिलती है। आंखों में फ्लू होने पर रसोत को पीसकर डालने से राहत मिलती है।

आयुर्वेद की तरह होम्योपैथी पद्धति में भी वायरल बीमारयों का इलाज है। इस पद्धति में लक्षण देखकर उपचार दिया जाता है। जिला अस्पताल सोलन के विशेषज्ञ डॉ. राजेश का कहना है कि होम्योपैथी में लक्षणों के आधार पर दवाएं दी जाती है, जिनका असर एलोपैथी से अधिक है। जैसे की एपिडैमिक होने पर कई बार आरसेनिक दवा काफी काम करती है, लेकिन लक्षण बदलने पर दवा बदलनी पड़ती है। प्रत्येक व्यक्ति को शरीर की प्रवृत्ति पर दवाई दी जाती है।

ञ्चवैक्सीन या तय दवा नही है। केवल वायरल लोड को कम करने के लिए दवाएं दी जाती है। मौसमी बदलाव के चलते शरीर का इम्यून सिस्टम कम होने पर वायरल अटैक होता है। इसलिए दवा से जरूरी सावधानी बरते जाने पर इन रोगों से बचा जा सकता है।
- डॉ. अनिल कांगा विभागाध्यक्ष माइक्रोबायोलॉजी, आईजीएमसी



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