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Chandigarh Chandigarh चंडीगढ़.
तेज धूप और पांव में चप्पल, पैंट पर धूल मिट्टी और बाल बिखरे हुए। परिचय हुआ तो बातों को दौर शुरू हुआ तो सामने साधारण सा नजर आने वाला यह शख्स बेहद संवेदनशील और ऊर्जावान निकला। शिल्प के प्रति अपने झुकाव पर कहा, ‘बचपन में कागज के पन्नों पर कुछ लकीरें खीचीं.. फिर मां से प्रेरणा मिली तो इन्हीं लकीरों को कुछ अर्थ मिलने लगे.. दोस्तों की हौसलाअफजाई से आत्मविश्वास बढ़ता गया।
फिर यही आत्मविश्वास मुझे चंडीगढ़ ले आया। मंगलवार दोपहर फाईन आर्ट्स कॉलेज की कैंटीन में बात हो रही थी युवा शिल्पकार परमिंदर सिंह से। परमिंदर का यही आत्मविश्वास इस बात से झलकता है कि ‘..मुझे अब लगता है कि मैं इन पत्थरों के लिए ही बना हूं..पत्थर पर हाथ रखते ही लगता है कि पत्थर पिघल जाएगा..’।
शायद परमिंदर की सृजनशीलता के कुछ नमूने देखकर आर्ट समीक्षक केशव मलिक ने कहा ‘एक कलाकार आग पैदा कर सके, इसके लिए उसके अंदर चिंगारी होनी चाहिए, इससे पहले कला का जन्म हो, कलाकार को उस आग में भस्म होने के लिए तैयार रहना चाहिए।’ केशव मलिक ही परमिंदर की 8 जून से दिल्ली के इंडिया हेबीटेट सेंटर के ओपन पॉम कोर्ट में शुरू होने वाली प्रदर्शनी का उद्घाटन करेंगे। परमिंदर ज्यादातर काम एबस्ट्रेक्ट है। लकड़ी के बजाय पत्थर को प्राथमिकता देते हैं।
इसकी वाजिब वजह भी बताते हैं। कहते हैं कि लकड़ी तो गल जाएगी लेकिन पत्थरों पर किया काम सदियों तक जिंदा रहेगा। पत्थर दब भी गए तो फिर कभी सामने आ जाएंगे। इन पत्थरों को मूर्त रूप देने का जज्बा कहां से आता है? तो कहते हैं कि यह मेरे अंदर की ऊर्जा है जो मुझे प्रेरित करती है। वे बताते हैं कि शिल्प के लिए मानसिक ही नहीं शारीरिक श्रम भी जरूरी है। मैं किसी भी काम को करने से पीछे नहीं हटता।
जहां कलाकार को सुकून हो, वहीं है सृजनशीलता
परमिंदर कहते हैं कि अगर कभी कोई ऐसा शख्स मिला जो मुझ पर भरोसा कर सका तो पहाड़ को भी मूर्त रूप दे सकता हूं। परमिंदर के पास इसका वैज्ञानिक आधार भी है। कहते हैं कि इंसानी जिस्म की ऊर्जा लिक्विड फॉर्म में है। मैं उसी ऊर्जा का इस्तेमाल करता हूं।
इस प्रक्रिया में कहीं उत्साह में कहीं आई हो तो बोले कभी लगता है कि घर की जिम्मेवारी का एहसास कई बार थोड़ी देर के लिए सोचने पर मजबूर करता है। फिर भी मेरी ऊर्जा साहस दे देती है। भविष्य की बात हुई तो बोले कि जहां कलाकार को सुकून हो, वहीं सृजनशीलता है। इसलिए मुझे कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं। बकौल परमिंदर सूरज कहीं भी चमके रोशनी तो पूरी दुनिया में होती है..मैं यहीं चमक कर दिखा दूंगा। परमिंदर के इस हौंसले को सलाम।