जयपुर. राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान की प्राइवेट पीएचडी को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। पीएचडी में बरती जा रही अनियमितताओं के चलते आयुर्वेद विश्वविद्यालय, जोधपुर के वाइस चांसलर और डीन ने 28 मई को होने वाली एकेडमिक काउंसिल की बैठक में इसमें भारी बदलाव करने या रोक तक लगाने की बात कही है।
इस आशंका से प्राइवेट डिग्री लेने के लिए सिनोप्सिस जमा कराने वाले अभ्यर्थियों की संख्या डेढ़ माह में 100 के पार पहुंच गई है। दो दिन में ही करीब 50 सिनोप्सिस जमा हुई हैं, क्योंकि रोक से पहले जमा होने वाली सिनोप्सिस को मान्यता की घोषणा पहले ही की जा चुकी है।
दूसरी तरफ संस्थान के नियमित पीएचडी स्कॉलरों व प्रोफेसरों ने आरोप लगाया है कि यह सब ‘निजी स्वार्थो’ के चलते हो रहा है। रिसर्च स्कॉलर गिर्राज उपाध्याय, विशाल शर्मा व उनके साथियों के अनुसार, ‘किसी बुराई को खत्म करने से पहले बढ़ावा देना कहां तक उचित है? और फिर वैसे भी शोध के विषय नियमित होने चाहिएं। हम इन दोहरे मापदंडों का विरोध करते हुए राज्यपाल से शिकायत करेंगे।’
संस्थान में रोग एवं विकृति विज्ञान के विभागाध्यक्ष प्रो. लोकनाथ शर्मा कहते हैं, ‘पीएचडी जैसी डिग्री की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए इस बंदरबाट पर रोक लगनी चाहिए। साथ ही इसकी गुणवत्ता बनाए रखने के लिए किसी प्रोफेसर को 5 से ज्यादा रिसर्च स्कॉलर को ही पीएचडी कराने की स्वीकृति दी जानी चाहिए।’