जालंधर. विएना की घटना को लेकर जालंधर समेत पंजाब में जो रोष उपजा उसे समझने में प्रशासन बिलकुल नाकाम रहा। सच तो यह है कि आतंकवाद के बाद प्रशासन में किसी तरह की जवाबदेही की भावना नहीं है। काले दौर के बाद जवाबदेही निर्वाह करने से चूके लोगों को पुरस्कृत किया जाना भी अफसरों को अकर्मण्य बनाया है। मौजूदा प्रकरण में भी प्रशासन नाकाम रहा।
एक अनुमान के मुताबिक राज्य में सात हजार करोड़ से ज्यादा की सरकारी और गैर सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंच चुका है। हजारों लोग यातायात ठप रहने के कारण घंटों तक फंसे रहे। प्रशासनिक अक्षमता के कारण जालंधर में 1984 के बाद सेना तैनात करनी पड़ी है।
मौजूदा स्थिति 2003 में हुई तल्हन की जातीय हिंसा की याद दिलाती है। उस समय भी जब तक स्थिति बेकाबू नहीं हो गई थी तब तक प्रशासन ने कोई ठोस उपाय नहीं किए थे। हाल यह हुआ कि एक गांव से शुरू हुआ टकराव पूरे इलाके में फैल गया और एक गांव में डेढ़ महीने तक कफ्यरू लगाए रखना पड़ा। इस मामले में विफल रहने वाले अफसर बाद में प्रमोट किए गए।
इस बार भी प्रशासन तब तक सोया रहा जब तक स्थिति बेकाबू नहीं हो गई। यह जानते हुए कि एक समुदाय विशेष का आक्रोश भड़क सकता है, प्रशासन ने उपाय नहीं किए। जहां सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जा सकता था, पुलिस बल तैनात नहीं किया गया। जब लोग भड़क गए और तोड़फोड़ शुरू हो गई तब प्रशासन हरकत में आया। लेकिन, तबतक बहुत देर हो चुकी थी।
संवेदनशील माने जाने वाले जालंधर कैंट रेलवे स्टेशन, पृथ्वी प्लैनेट, जालंधर फगवाड़ा हाईवे पर समय रहते पुलिस बल तैनात किया गया होता तो संभवत: हुए नुकसान से बचा जा सकता था। एक पुलिस अफसर के मुताबिक सख्ती नहीं करने के निर्देश दिए गए थे। यही वजह थी कि गाड़ियां जलती रही, पुलिस तमाशा देखती रही।