जालधंर. रविवार की शाम तक सबकुछ ठीक था। हम परिवार के साथ टीवी पर आईपीएल क्रिकेट मैच देख रहे थे। मैच देखने के बाद शहर के बाहर जीटी रोड पर स्थित एक रेस्त्रां में डिनर का मूड बना तो पत्नी, बहू, बेटे और पोती के साथ कार से चल पड़े।
उस समय हमें मालूम नहीं था कि शहर का माहौल बिगड़ गया है। रामामंडी चौक से काफी आगे यातायात जाम दिखा। लोगों की भीड़ जमा हो रही थी। वहां मौजूद एक पुलिस अधिकारी से भीड़ और जाम की वजह पूछी तो टका सा जवाब मिला, ‘मैनूं की पुछदे ओ, जा के देख लवो।’ उधेड़बुन में आगे बढ़े।
होटल ग्रैंड मैजस्टिक के आगे ट्रैफिक जाम था। वहीं मोटरसाइकिल पर डंडा लिए एक युवक से पूछ लिया कि लोग लौट क्यों रहे हैं? टके सा जवाब मिला, ‘आप टीवी नहीं देखते? शहर में तनाव है, आगे जाओगे तो कार और सिर दोनों तुड़वाओगे।’ इतना सुनते ही हमने तुरंत कार मोड़ ली। अचानक शोर बढ़ने पर हमने होटल हाईवे इन के सामने कार रोक दी और वहां शरण ले ली।
देखते-देखते पंद्रह-बीस कारें और जमा हो र्गई। डरे हुए सभी चेहरे एक दूसरे से यही सवाल कर रहे थे आखिर हुआ क्या? उसी समय पीएपी चौक से धमाकों की आवाजें आने लगीं। होटल में लोग कमरों में इधर-उधर छिपने लगे। उसी डरी हुई भीड़ में दुल्हन की लिबास में एक लड़की बार-बार घड़ी देख रही थी। उसे शायद मुहुर्त टलने की चिंता सता रही थी। एक आदमी हिम्मत कायम रखने के लिए कार से बोतल निकाल कर नीट ही घटकने लगा। एक व्यापारी सा आदमी मोबाइल पर लगातार किसी को रनिंग कमेंट्री दे रहा था।
तब तक रात के 11 बज चुके थे। अचानक दोपहिया वाहनों पर सवार एक जत्था पीएपी चौक की तरफ से आया और कारों पर धावा बोल दिया। होटल के बाहर लगे शीशों पर पत्थरों की बौछार करने लगे। हमे लगा जैसे गोलियां चल रही हैं। होटल में मौजूद लोगों के बीच अफरा-तफरी मचने लगी। मैं भी अपने परिवार के साथ पहली मंजिल के एक बाथरूम में जा कर छिप गया। नीचे नारों और तोड़-फोड़ आवाज तेज होने लगी। तभी एक पत्थर बाथरूम का कांच तोड़ता हुआ अंदर आ गिरा। मैनेजर ने हमें तीसरी मंजिल के टैरेस पर छिपने की सलाह दी। कच्ची सीढ़ियों पर रेंगते हुए हम टैरिस तक पहुंचे। निचली मंजिलों पर आधा घंटा तोड़फोड़ चलती रही। डरे हुए मोबाइल पर पुलिस का नंबर मिला रहे थे, लेकिन नंबर बिजी चल रहा था।
लंबे शोर के बाद जब खामोशी छाई तो छत से डरते-डरते झांक कर देखा। पंद्रह-बीस नौजवान लाठियां लिए खड़े थे। फोन से जिन मित्रों, पुलिस वालों से बात हो पाई उन्होंने सूचना दी पीएपी चौक में और दूसरी ओर मैक्डोनॉल्ड के पास घमासान हो रहा है। होटल में सन्नाटा पसरा था।
हम वहां छह घंटे फंसे रहे। सहायता की कोई आशा नहीं दिख रही थी। फिर जीटी रोड पर गाड़ियों की हलचल शुरू हुई। इन्हीं गाड़ियों की भीड़ में हमने भी घर लौटने का फैसला लिया। हम नीचे उतरे तो देखा कि हमारी कार चकनाचूर हो चुकी है। कार की हालत देख कर मेरी पोती ने पूछा, ‘हमारी कार का यह हाल किसने किया?’ मैंने एक झूठ उससे कहा, ‘रात आंधी में एक पेड़ हमारी कार पर आ गिरा।’ पोती ने रोते हुए कहा, ‘हम अब कभी जालंधर नहीं आएंगे। यहां बहुत बुरी आधियां आती हैं।’
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