जयपुर. सफलता मीठी भी होती है, सलोनी भी। ..और इसलिए सारे दुख-दर्द भुला देने वाली भी। टेंथ में 94.2 प्रतिशत लाने के बाद सलोनी भी अपना सारा दर्द भूल गई। उसकी सुबह की निराशा, दोपहर की बेचैनी और संध्या की उदासीनता तिरोहित हो गई। जागती रातों के संघर्ष ने सफलता के सूरज को उसके कदमों में डाल दिया।
जी! फेब्रोमेटोसिस के ट्यूमर से पीड़ित सलोनी की यह सफलता सबसे बड़ी है। शायद ईश्वर बेटियों को दर्द सहने की दैवीय क्षमता देता है। उसकी बीमारी उसे बैठने तक नहीं देती। वह चलते-फिरते और लेटकर पढ़ती रही। संघर्ष के इस शिखरत्व पर शरीर में पलता ट्यूमर बौना हो गया। अपना सफलता का संदेश लेकर यह बच्ची जब भास्कर कार्यालय पहुंची तो साथ में आए पिता टीकाराम शर्मा की आंखें कलश हो गई थीं।
उनकी खुशी, उनके गर्व की निर्मलता दोनों कलशों से छलक रही थी। सफलता की निर्मलता देखिए कि सलोनी के संघर्ष के आगे यहां आए अधिकांश बच्चे नतमस्तक हो गए। 96 और 97 प्रतिशत लाने वाले बच्चों ने भी सलोनी से कहा- तुम्हारी सफलता हमसे बड़ी है, देश में- दुनिया में सबसे ऊंची है। सलोनी के पिता सचिवालय में विधि सहायक हैं और मां मधु शर्मा लेक्चरर। सलोनी की बीमारी का पता 2005 में चला जब उसे पैर फोल्ड करने में परेशानी होने लगी। अब तक उसके तीन ऑपरेशन हो चुके हैं। लेकिन हर बार कुछ न कुछ रह जाता है और समय बीतते सलोनी को फिर दर्द होने लगता है।
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