इडली बेचकर भी बनेंगे इंजीनियर
Elections 2009 Divya Bhaskar Business Bhaskar Indiainfo DNA 3Dsyndication MyFM Mera Mobi


इडली बेचकर भी बनेंगे इंजीनियर

राजनांदगांव. Ashok सड़क किनारे हाथ ठेला पर इडली-दोसा की दुकान लगाने वाले 19 वर्षीय बी. अशोक राव को एकबारगी देखने पर यकीन नहीं होगा कि वह इंजीनियरिंग का छात्र भी हो सकता है।

मात्र 11 वर्ष की उम्र में अपने पिता की मृत्यु के बाद वह इस तरह अपनी पढ़ाई और घर का खर्च चला रहा है। उसकी जिद है एक सफल इंजीनियर बनना है, भले ही इसका रास्ता इडली के ठेले से होकर जाता हो। अशोक को इंजीनियरिंग का छात्र होकर ठेला लगाने में कोई शर्म महसूस नहीं होती।

राजनांदगांव से 20 किमी दूर ग्राम टेड़ेसरा निवासी अशोक छत्तीसगढ़ इंस्टीटच्यूट आफ टेक्नालाजी (सीआईटी) में इलेक्ट्रिकल व इलेक्ट्रानिक्स ब्रांच के द्वितीय सेमेस्टर में अध्ययनरत है। पिता जी. कुमार स्वामी की मौत के बाद उनके मौसा पीबी राव ने अशोक के परिवार को सहारा दिया।

श्री राव स्वयं टेडेसरा के एक संयंत्र में कार्यरत हैं। अशोक ने बताया कि उनकी मां जी. वसंता के लिए अपने दोनों बेटों की शिक्षा-दीक्षा एक चुनौती थी, खासकर तब जब घर में आय का कोई जरिया नहीं बचा था। ऐसे समय में अशोक ने जिम्मेदारी संभाली। उसने टेड़ेसरा में ही शाम पांच से आठ बजे तक जीईरोड किनारे ठेला लगाना शुरू किया, जो अब भी जारी है। इससे घर का खर्च तो निकला ही, उसे अपने साथ छोटे भाई की पढ़ाई में भी मदद मिली। अशोक का छोटा भाई शिवा अभी दसवीं का छात्र है और उसके हर काम में हाथ बंटाता है।

मां घर पर दुकान का सारा सामान तैयार करती है और अशोक उसे ठेले पर बेचता है। इससे दिनभर में औसतन सौ रुपए की आय हो जाती है। अशोक ने बताया कि आर्थिक तंगी के चलते उसने कभी कालेज तक पहुंचने का भी नहीं सोचा था, इंजीनियरिंग की पढ़ाई तो दूर की बात है। हाईस्कूल की शिक्षा उसने राजेंद्र विद्यालय, सोमनी में पूरी की। दसवीं बोर्ड की परीक्षा में उसने 82 प्रतिशत अंक हासिल किए।

शिक्षकों ने उसकी प्रतिभा देख प्रोत्साहित किया। उसने आगे की पढ़ाई के लिए मैथ्स को मुख्य विषय के रूप में चुना। 12वीं बोर्ड में भी उसे 77 फीसदी अंक मिले। स्कूली सफलता के बाद अशोक ने पीईटी में भाग्य आजमाने की सोची। और इसमें शामिल हुआ परिणाम उत्साहजनक आया। इसी वजह से उसे काउंसलिंग में इच्छानुसार विषय चुनने का अवसर मिला और उसने पर्ाीनाला (राजनांदगांव) स्थित सीआईटी कालेज में प्रवेश लिया।

शासकीय योजना के तहत उसे निशुल्क प्रवेश तो मिला, लेकिन अगले वर्ष ही काउंसलिंग में कोटा सिस्टम के चलते एक छात्रा को प्राथमिकता मिली। पढ़ाई बीच में ही छूट जाने की आशंका से अशोक निराश हो गया, लेकिन सीआईटी प्रबंधन ने सहयोग का हाथ बढ़ाया। सीआईटी के डायरेक्टरों ने वार्षिक परीक्षा शुल्क माफ करने की पहल की। इन डायरेक्टर्स में से एक धीरज कन्नौजे कहते हैं कि अशोक एक काबिल इंजीनियर बनने की राह पर है।



   Bookmark and Share




अपने विचार यहां लिखें:
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: