अमृतसर. नेहरू के गम में,
दुनिया से महबूब भी गया
राही भी कूच कर गया,
रहिबर के साथ-साथ।
लो हो गई आज मुहब्बत की इंतहा,
कतरा भी खो गया,
समुंदर के साथ-साथ।
27 मई 1964 के दिन ने मशहूर शायर शकील बदायूं को उक्त पक्तियां लिखने पर मजबूर कर दिया। उस दिन देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का निधन हुआ था। इस पर शकील बदायूं ने कुछ यह लिख श्रद्धाजंलि दी...
खामोशी है वतन की महफिल में, साज टूटा है राग उजड़ा है।
तेरे रुठने से ए जवाहर,
जिंदगी का हर सुहाग उजड़ा है।
दौलते कितनी तुझ से पाई है,
हम न भूलेंगे तेरे लुत्फों करम।
जाते-जाते भी तूने ए नेहरू,
दे दिए हमको अपने नक्शे कदम।
आज भी तू हमारे सामने हैं,
सबर लाजिम है गम शहीदों को।
हम तुझे किस लिए कहे फानी, मौत आती नहीं शहीदों को।
नेहरू की मौत की खबर सुन मशहूर फिल्म डायरेक्टर और प्रोड्यूसर महबूब खान को काफी सदमा पहुंचा। उन्होंने उनकी बेटी इंदिरा गांधी को शोक संदेश भेजा। जैसे ही वह संदेश डाक में डालकर वापस लौटे, उनका भी दम निकल गया।
इस पर बदायूं की कलम रुक न सकी और दिले ख्याल को शब्दों में कह डाला..मेरे महबूब मेरे देश के सच्चे फनकार,
जिंदगी भर यूं ही परचम तेरा लहराएगा।
जब कभी भी फिल्म की तारीख लिखी जाएगी,
सर-ए-फेहरिस्त यकीनन तेरा नाम आएगा।
तू सदा दिल में रहेगा, मेरे महबूब वतन,
मौत आने से कहीं प्यार फना होता है।
याद कर लेंगे तुझे जब भी याद आएगी,
मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है, होता वही है, जो मंजूरे खुदा होता है।
ऐसी पंक्तियों के साथ उन्होंने अपने मनोभाव व्यक्त किए, जो आज भी शब्दों के तौर पर जिंदा हैं।
संकलन: एनएस गाबड़िया, रिटायर्ड स्टेशन मास्टर अमृतसर