ऊन की जगह कतरनों से बन रहे धागे
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ऊन की जगह कतरनों से बन रहे धागे

बीकानेर.bunkar रानी बाजार इंडस्ट्रीयल एरिया स्थित लक्ष्मी वूलन मिल में कुछ महीनों पहले तक विश्वविख्यात वूलन यार्न बनते थे और उन्हें एक्सपोर्ट किया जाता या कारपेट में उपयोग के लिए भेजा जाता। आर्थिक मंदी से कुछ महीने बंदी भी रही मिल मगर अब यहां पॉलिस्टर और सूती कपड़ों की कतरनों के ढेर लगे हैं। इन कपड़ों को मशीन से प्रोसेस कर रुई में बदला जा रहा है और इस रुई को वापस धागा बनाया जा रहा है।

इस धागे को नाम दिया गया है पीसी यानी पॉलिस्टर कम कॉटन फाइबर। कुछ ऐसा ही काम हो रहा है करणी इंडस्ट्रीयल एरिया की पुनीत इंडस्ट्रीज सहित पांच-छह अन्य वूलन यार्न यूनिटों में। आर्थिक मंदी में आधे से अधिक वूलन यार्न यूनिट बंद हो जाने के बाद इस उद्योग में लगे लोगों ने अब धंधे को बदलने का मानस बना लिया है और इसी कड़ी में स्थानीय बाजार तलाशा जा रहा है।

शुरुआत में पीसी फाइबर का काम ठीक लगा रहा है जिसके लिए वर्तमान मशीनों के साथ ही मामूली परिवर्तन के साथ काम शुरू किया जा सकता है। पानीपत से इस नए उद्योग की बारीकियां सीखने के साथ ही कुछ कुशल श्रमिक भी लाए गए हैं और धीरे-धीरे पांच-छह यूनिट ने यह काम शुरू कर दिया है। अभी प्रोडक्ट बाजार में नहीं उतारा है बस काम पर हाथ जमाने का दौर चल रहा है।

शुरुआत भले ही पीसी से हुई हो मगर उद्यमियों की नजर में सोढ़ी, एक्रिलिक आदि धागे हैं और कोशिश है कि इस बार धंधा कुछ ऐसा जमाया जाए कि यूनिट से सिर्फ धागा ही नहीं फाइनल प्रोडक्ट भी बाहर आए। एक महीने से पीसी यार्न बना रहे उद्यमी सुभाष मित्तल का कहना है, यह ज्यादा मार्जिन का काम नहीं है और खपत भी राजस्थान, यूपी जैसे लोकल मार्केट में हैं मगर मंदी के दौर में यूनिट तो चलानी ही है।

ऐसे में मामूली तब्दीलियों के साथ होने वाला यह काम हौसले के साथ शुरू किया है। कुछ ऐसा ही कहना है प्रेम मित्तल का भी। वे कहते हैं, फिलहाल सैंपल के लिहाज से पीसी यार्न बनाया है। कुछ माल तैयार हो जाएगा तो मार्केट का रुख करेंगे और देखेंगे कि रिस्पांस कैसा मिलता है। इस शुरुआत को बड़े स्तर पर ले जाकर उद्यमी बीकानेर की वूलन इंडस्ट्री में आमूल-चूल परिवर्तन कर देने की जरूरत जताते हैं।

राजस्थान वूलन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष ब्रजमोहन चांडक का कहना है, ऊन उद्योग के इतिहास पर नजर डालें तो इस उद्योग पर कई बार संकट आए हैं, उद्योग बंद हुआ है फिर कुछ बदलावों के साथ वापस चल भी पड़ा है। लेकिन ये संकटों का मुकाबला करने और इंडस्ट्री को सरवाइव करने के लिए अब इस स्तर पर तैयारी करनी होगी कि फाइनल प्रोडक्ट यहीं से निकले और मार्केट में सीधे सेल के लिए जाए। पानीपत और लुधियाना की होजियरी इंडस्ट्री इसीलिए फल-फूल रही है क्योंकि वहां से फाइनल प्रोडक्ट निकलता है। बीकानेर में उससे कहीं अधिक संभावनाएं हैं, जरूरत बस हौसले की है।



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