भोपाल.
लोकसभा चुनाव के बाद अब नगरीय निकायों की बारी है। प्रदेश में साल के अंत में ये चुनाव होंगे। वर्तमान में प्रदेश के 14 नगर निगम में से 12 पर भाजपा का कब्जा है।
सिर्फ भोपाल और उज्जैन ऐसे शहर हैं जहां पर कांग्रेस के महापौर हैं। निकायों में दोबारा वर्चस्व कायम करना जहां भाजपा के लिए की चुनौती है वहीं लोकसभा चुनाव में मिली बढ़त से कांग्रेस उत्साहित है और उसने अब शहरों पर ध्यान केंद्रित किया है।
प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव नवंबर 2004 में हुए थे, लेकिन उनके पांच साल के कार्यकाल की गणना उनकी परिषदों की पहली बैठक से होती है। इसलिए ज्यादातर निकायों का कार्यकाल दिसंबर 2009 या जनवरी 2010 में पूरा होगा। यही वजह है कि राज्य निर्वाचन आयोग में इस चुनाव की तैयारी की अभी सुगबुगाहट तक नहीं है।
निकायों के परिसीमन और आरक्षण का अधिकार राज्य शासन ने अपने पास रखा हुआ है। सितंबर तक यह कार्यवाही पूरी नहीं हुई तो आयोग वर्तमान परिसीमन के आधार पर ही चुनाव कराएगा।
भाजपा सरकार के काम-काज के आधार पर चुनाव लड़ेंगे। शहरों पर फिर जीत दर्ज करेंगे। गलतियों से सबक लेंगे। - आलोक शर्मा अध्यक्ष, भाजपा नगरीय प्रकोष्ठ
भाजपा: कब्जा बरकरार रखने की चुनौती
लोकसभा चुनाव से पस्त हुई भाजपा को फिर नगरीय निकाय चुनाव का नाम सुनकर पसीना आ रहा है। भाजपा के हाथों खिसक रहे जनाधार को पाने के लिए भीतर ही भीतर चर्चाएं तो हो रही हैं, लेकिन क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
इन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है। हालांकि वर्ष 2004 में प्रदेश की 14 नगर निगम में से 12 पर भाजपा का कब्जा है। इसी तरह 87 नगरपालिका में से 42 पर और 237 नगर पंचायत में से 101 पर भाजपा ने जीत दर्ज की थी।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते है कि निकायों पर पुन: वर्चस्व कायम करना भाजपा के लिए कड़ी चुनौती है। शहरों में भाजपा का प्रभाव कम हो रहा है।लोकसभा चुनाव में भाजपा को उज्जैन, देवास, रतलाम, खंडवा, बुरहानपुर, रीवा में हार का सामना करना पड़ा है।
इसी के साथ ही इंदौर, भोपाल, जबलपुर, सतना, ग्वालियर में भितरघात का आरोप खुलकर सामने आए हैं। पार्टी कार्यालय में रोजाना शिकवा- शिकायतों का दौर चल रहा है। इसका प्रभाव नगरीय निकाय चुनाव पर पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
कांग्रेस की नजर शहरों पर
भोपाल. प्रदेश की 12 लोकसभा सीटों पर कब्जा जमाने के बाद प्रदेश कांग्रेस के हौंसले भले ही बुलंद हों, लेकिन आगामी नवंबर में होने वाले नगरीय निकायों के चुनाव उसके लिए आसान नहीं है। विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सीटें दो से तीन गुना बढ़ाने का श्रेय अपने खाते में ड़ाल चुके प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी के लिए नगरीय निकाय के चुनाव नई चुनौती बन कर आ रहे हैं।
हालांकि भाजपा के परंपरागत गढ़ मालवा निमाड़ के प्रमुख शहर उज्जैन, देवास, खंडवा, मंदसौर के ढ़हने से कांग्रेस में जोश में है लेकिन लोकसभा के परिणामों का प्रभाव नगरीय निकायों तक टिका पाना आसान नहीं है। वर्ष 2004 में प्रदेश की 38 नगर पालिकाओं पर पार्टी ने कब्जा जमाया था।
तब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष यादव थे तथा माना जा रहा था कि उनकी ग्रामीण क्षेत्र की राजनीतिक पकड़ के चलते यह संभव हो पाया था। अब केंद्र में चूंकि कांग्रेस की सरकार है तथा नगरीय निकायों के लिए करोड़ों की रुपए की राशि जेएनआरयूएम तथा अर्बन डेवलपमेंट के नाम पर आ रही है इसलिए कांग्रेस की नजर अब प्रदेश के बड़े शहरों पर है।
सूत्रों के अनुसार कांग्रेस पार्टी संगठन में कसावट लाने की तैयारी कर रही है। निचले स्तर के कार्यकर्ता को सक्रिय करने के लिए पार्टी संगठन में खाली पड़े पदों को भरने तथा कुछ बदलाव के भी आसार हैं।
ञ्चकेंद्र सरकार की उपलब्धियां ही नगरीय निकायों का एजेंडा होगा। इस बार शहरों पर हमारी नजर है।
- राजीव सिंह महामंत्री, प्रदेश कांग्रेस