जयपुर. यदि व्यक्ति स्वयं पर नियंत्रण रखे तो कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी से आधे लोगों को बचाया जा सकता है। कैंसर अस्पतालों में पहुंचने वाले करीब आधे रोगी वो हैं जो धूम्रपान, तंबाकू, गुटखा, खैनी आदि के आदि हैं।
अकेले भगवान महावीर कैंसर अस्पताल में ही पिछले वर्ष आए लगभग 6 हजार कैंसर रोगियों में से ढाई हजार से ज्यादा को कैंसर किसी और वजह से नहीं बल्कि तंबाकू के सेवन की वजह से था। भगवान महावीर कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र जयपुर के परमर्शदाता एवं वरिष्ठ कैंसर विशेषज्ञ डॉ. अजय बापना ने बताया कि यदि वे गुटखा नहीं खाते, बीड़ी, सिगरेट, हुक्का नहीं पीते तथा तंबाकू या लाल दंतमंजन नहीं करते तो इस रोग से बच सकते थे।
रिस्क फैक्टर कम पर असर नहीं : विशेषज्ञडॉ. जी.डी. पारीक ने बताया कि तंबाकू के सेवन की आदत छूट जाने से रिस्क फैक्टर कम हो जाता है, लेकिन इसका असर पूरी जिंदगी बना रहता है। अभिभावकों को बच्चों के आचार-व्यवहार पर नजर रखते हुए उन्हें शुरू से ही तंबाकू के घातक परिणामों से अवगत कराते रहना चाहिए ताकि वे अनजाने में भी इसके आदी नहीं हो पाएं।
पहले खुद आदी थे, अब लोगों को बदल रहे हैं : इंडियन अस्थमा सोसायटी के सचिव धर्मवीर कटेवा ने बताया कि वे लंबे समय से लोगों को तंबाकू के सेवन से मुक्त रहने के प्रति जागरूक कर रहे हैं। बहुतों को किया लेकिन इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जो इसे छोड़ने के बाद अब खुद लोगों की छुड़ा रहे हैं।
आधुनिक जीवन शैली व गलत खान-पान से बढ़ रहा है कैंसर : आधुनिक जीवन शैली और गलत खान-पान के कारण लोगों में कैंसर तेजी से फैल रहा है। कैंसर का सबसे बड़ा कारण तंबाकू का सेवन है और इस कारण प्रतिवर्ष लगभग 2200 लोगों की मौत हो जाती है। यह कहना है डॉ. अरुण चौगले का।
भारत विकास परिषद की प्रताप शाखा की ओर से जयपुर कैंसर सोसायटी के सहयोग से राजापार्क स्थित भगतसिंह पार्क के डे केयर सेंटर पर कैंसर विषयक गोष्ठी हुई। मुख्य अतिथि सुधींद्र गेमावत ने सोसायटी द्वारा कैंसर पीड़ितों की सहायतार्थ किए जा रहे कार्र्यो पर प्रकाश डाला।
इस दौरान परिषद अध्यक्ष श्याम मदान, संरक्षक व पूर्व पार्षद राम खंडेलवाल, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी एस.डी. मदान आदि ने विचार प्रकट किए और सभी से स्वस्थ्य जीवन शैली अपनाने, तंबाकू उत्पादों का त्याग करने आदि का संकल्प दिलाया।
स्वर्ग जैसा हो गया घर का माहौल
राजस्थान पुलिस में सबइंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत एस.एस. सिंह (परिवर्तित नाम) की नशे की आदत के कारण घर में कलह का माहौल था। शराब, बीड़ी, सिगरेट और जर्दे के सेवन के बिना तो उसे बेचैनी होने लगती थी। सिंह ने बताया कि कभी कभार ज्यादा दारू पीने से घर में झगड़े तक की नौबत आ जाती थी। रात में बच्चे पढ़ नहीं पाते थे। पत्नी और बेटे-बेटी लाख समझाते दारू छोड़ने के लिए।
रिश्तेदारों ने भी काफी समझाया, पर लत ऐसी पड़ गई कि छूट ही नहीं पा रही थी। दारू का नशा उतरता तो कई बार बच्चों के सामने लज्जा का अनुभव होता। आखिर सन 2002 में कालवाड़ में पंचकुंडीय गायत्री यज्ञ हुआ था।
उसमें दीक्षा लेकर मैंने इन सभी व्यसनों को त्यागने का संकल्प लिया। कुछ दिनों तक तो मुझे अजीब सा लगा, लेकिन गुरुजी श्रीराम शर्मा की प्रेरणा से मेरा यह संकल्प टूटा नहीं। आज स्थिति यह है कि दोनों बेटे खुद अच्छा कमा रहे हैं। बेटियों की धूमधाम से शादी कर दी। मैं भी कांस्टेबल से सब इंस्पेक्टर बन गया। परिवार के माहौल के बारे में बस इतना ही कहूंगा कि घर का माहौल स्वर्ग जैसा हो गया।