चेचट. एक-दो बच्चों के बाद नसबंदी ऑपरेशन करवाकर दंपती जनसंख्या नियंत्रण में सहयोग करने के साथ ही स्वयं के आर्थिक विकास को लेकर भी निश्चिंत हो जाते हैं। सरकारी योजनाओं में चिकित्सालयों में जारी नसबंदी शिविर ऐसे दंपतियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं। सीमित व छोटे परिवार के पोषण के लिए वरदान बने नसबंदी शिविर कभी-कभी मुसीबतों का सबब भी बन जाते हैें।
खासकर जब नसबंदी के बाद भी दंपती को संतान को जन्म देना पड़े। ऐसा ही वाक्या हुआ है चेचट के पास फाणदा निवासी बाबूलाल मेघवाल के साथ। बाबूलाल ने बताया कि उसकी पत्नी संतोष बाई ने पांच साल पूर्व सात दिसम्बर 2004 को चेचट में आयोजित नसबंदी शिविर में ऑपरेशन करवाया था। नसबंदी ऑपरेशन के करीब तीन साल बाद उसने पांच दिसम्बर 2007 को कस्बे के स्वास्थ्य केन्द्र पर बच्चे को जन्म दिया।
पहले से तीन बच्चों के पिता बाबूलाल ने बताया कि महंगाई के समय में ज्यादा बच्चों की परवरिश सहज नहीं होने को लेकर ही उसने पत्नी संतोष का ऑपरेशन करवाया था। जो भी फेल हो गया। रोजगार के रूप में खदान में ड्राईवर का काम करने वाले पिता के सामने नसबंदी के बाद भी बच्च होने से उसकी अच्छी परवरिश की चिन्ता है।
नसबंदी केसों में अधिकतम चार प्रतिशत केस फेल होने के आसार होते हैं। ऐसे में सरकारी प्रावधानों के तहत केस फेल होने की सूचना मिलने के साथ ही दंपंती को उचित मुआवजा देने के लिए विभाग को लिखा जाता है। -डॉ. एनडी हिरानी, चिकित्सा प्रभारी चेचट