रायपुर.
आंबेडकर अस्पताल के रीजनल कैंसर सेंटर में रोजाना 250 नए-पुराने मरीज इलाज के लिए पहुंचने लगे हैं। यह आंकड़ा केवल लोकल यानी राज्य के मरीजों का है। उड़ीसा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के कुछ इलाकों से भी मरीज उपचार के लिए आ रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है बीड़ी-सिगरेट की तुलना में यहां तंबाकू वाला गुटखा ज्यादा सस्ता है। गांव, कस्बे और शहर के लोग इसका ज्यादा उपयोग करते हैं। यही वजह है कि बीड़ी-सिगरेट की तुलना में यहां तंबाकू-गुटखे से होने वाले कैंसर के मरीज ज्यादा हैं।
डाक्टरों ने बताया कि मरीजों में जागरूकता का भी काफी अभाव है। कैंसर के लक्षण शुरू होते ही मरीज उपचार के लिए नहीं पहुंचते। सामान्य बीमारी मानकर घरेलू नुस्खों का उपयोग करने लगते हैं। अंतिम स्टेज में पहुंचने के बाद अस्पताल पहुंचते हैं।
उन हालात में डाक्टरों के लिए रोग का इलाज या उस नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है। डाक्टरों का कहना है कि अगर समय रहते मरीज उनके पास आ जाएं तो बीमारी को बहुत कारगर ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है। ऐसे अनेक मामलों में मरीज लगभग सामान्य जीवन गुजार रहे हैं। उन्होंने कहा कि कैंसर के लक्षणों के बारे में लगातार प्रचार किया जाता है लेकिन बड़े पैमाने पर अज्ञान या बेपरवाही अभी भी बाकी है।
आंबेडकर अस्पताल में अभी रेडिएशन के लिए कोबाल्ट और ब्रेकीथेरैपी मशीनें उपलब्ध हैं। इन्हीं मशीनों के जरिये मरीजों का उपचार किया जा रहा है। अस्पताल में कैंसर का उपचार हाईटेक करने की प्रक्रिया तेजी से चल रही है। फिलहाल कंप्यूटर प्लानिंग सिस्टम बनाया गया है। इसी के जरिये मरीजों को रेडिएशन देने की सिटिंग का शेडच्यूल तय किया जाता है। आंबेडकर अस्पताल के कैंसर विशेषज्ञ डा. एसके आजाद ने बताया कि कैंसर पीड़ितों में केवल 5 प्रतिशत ही प्रारंभिक स्टेज में इलाज करवाने के लिए पहुंचते हैं। 15 प्रतिशत मरीज दूसरी स्टेज में आते हैं।
80 प्रतिशत मरीज अंतिम स्टेज में पहुंचने के बाद यहां आते हैं। यही वजह है कि उनके इलाज में तकलीफ उठानी पड़ती है। अस्पताल में 8 करोड़ की कीमत वाली लीनियर एक्सीलीरेटर मशीन खरीदी जा रही है। इसके आर्डर दिए जा चुके हैं। जुलाई में मशीन मरीजों के लिए उपलब्ध हो जाएगी।
इस मशीन के स्थापित होने के बाद छग का आंबेडकर अस्पताल विश्व स्तरीय सुविधाओं वाले कैंसर सेंटर में शामिल हो जाएगा। लीनियर एक्सीलीरेटर मशीन एडवांस तकनीक वाली है। इसके जरिए रेडिएशन देने पर साइड इफेक्ट का खतरा नहीं रहता।
केस-1: बेचने पड़े खेत
दुर्ग के सूरज प्रकाश के मुख के कैंसर ने पूरे परिवार की संपत्ति छीन ली। उसके पिता ने बताया कि साढ़े तीन एकड़ खेत बेचकर भी बेटे की तकलीफ दूर नहीं कर सका। अंत में रेडिएशन का ही विकल्प बचा है। बेटे का मर्ज बताते हुए बुजुर्ग की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा लाख समझाने के बाद भी उसने तंबाकू को चूने में मसलकर अपने होठों के पास दबाना नहीं छोड़ा। आज पूरा परिवार इसी गलती की सजा भुगत रहा।
केस-2: नर्क हो गई जिंदगी
गुटखे की लत ने टिकरापारा के साहू परिवार की जिंदगी को नर्क बना दिया। 29 साल के रूपेंद्र की जीभ पर कैंसर हुआ। तीन साल इलाज करवाने के बाद भी मर्ज ठीक नहीं हुआ। आपरेशन के बाद जीभ की नोंक के बाजू वाला हिस्सा काटना पड़ा। उसके बाद रेडिएशन भी दिया गया। इलाज में घर की पूंजी गंवाने के बादबीमारी तो दूर हो गई लेकिन युवक अधेड़ दिखने लगा है। उसे रूटीन चेकअप कराने आंबेडकर अस्पताल आना पड़ता है।
केस-3: खाना-पीना सब बंद
महासमुंद तुमगांव के अधेड़, राम स्वरूप की आहार नली में कैंसर हो गया। लगातार तंबाकू मुंह में दबाने और बीड़ी पीने की लत ने इस बुजुर्ग को मौत के मुंह पर ला दिया है। उसने तीन साल से भोजन ग्रहण नहीं किया है। बातचीत के दौरान उसने इस संवाददाता के सामने हाथ जोड़ दिए और कहा-बाबू मेरे में बारे में सबको बताकर समझाना कि मैं कैसी तकलीफ उठा रहा हूं। सबकुछ करें पर तंबाकू का सेवन बंद कर दें।
एक नजर इधर भी
देश में 9 लाख लोग हर साल कैंसर से मरते हैं। तंबाकू के इस्तेमाल के कारण हर रोज 2500 भारतीयों की मौत होती है। पूरी दुनिया में मुख के कैंसर के सबसे ज्यादा मरीज भारत में ही हैं। एक अनुमान के अनुसार 2010 तक धूम्रपान से होने वाली बीमारियों से मरने वालों की संख्या बढ़कर 10 लाख हो जाएगी।
2020 तक स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। तंबाकू से होने वाली कमाई की तुलना में उससे होने वाली बीमारियों पर ज्यादा धन खर्च हो रहा है। सिगरेट बीड़ी से होने वाले कैंसर पर 4535 करोड़ व गुटखा, जरदा खैनी से होने वाले कैंसर पर 1425 करोड़ खर्च हो रहे हैं।
सिंकाई का आंकड़ा बढ़ेगा
नई मशीनें आने के बाद कोबाल्ट और ब्रेकीथैरेपी मशीन पर दबाव कम होगा। उसके बाद 150 मरीजों की सिंकाई रोजाना हो सकेगी। नई मशीनो के लिए भवन तैयार हो चुके हैं। सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे आने वालों के लिए मुफ्त सिंकाई की सुविधा मुहैया करायी है।
जरूरत है
छग के गांवों में कैंसर के प्रति जागरूकता लाने की जरूरत है। गांव-गांव जाकर लोगों को कैंसर के खतरों से आगाह कराने के साथ लक्षण भी बताने होंगे। अभी तक इस दिशा में ठोस पहल नहीं की गई है। केवल अस्पताल में ही कैंप लगाकर चेकअप किया जाता है।
तंबाकू से कैंसर का खतरा क्यों
विश्वस्तर पर की गई पड़ताल में यह प्रमाणित हो चुका है कि तंबाकू में कैंसर के 43 कारक होते हैं। सिगरेट के धुएं और गुटखे के लगातार सेवन से ये शरीर में दाखिल होते हैं। गुटखा लगातार खाने से मुंह में गहरे निशान होने लगते हैं। धीरे-धीरे वह जख्म की शक्ल लेने लगता है। गुटखा मुंह में रखकर चबाने से उसी घाव के जरिये तंबाकू में शामिल कैंसर के कारक शरीर में दाखिल होते हैं।
कैंसर के लक्षण
डाक्टरों के मुताबिक कुछ लक्षण हैं जिनके जरिए कैंसर को इसकी शुरुआत में ही पहचाना जा सकता है। सिगरेट ज्यादा पीने वालों को कैंसर होने के पहले छाती में दर्द होने लगता है। धीरे-धीरे सांस फूलने की तकलीफ शुरू होती है। खांसी के साथ खून के थक्के जमने लगते हैं। मुख कैंसर वालों के मुंह में पहले छाले होते हैं। जरा भी तीखा खाने पर मुंह जलने लगता है। खाने में तकलीफ बढ़ने लगती है।
गले में गठान हो जाती है और इसके साथ ही आवाज में बदलाव हो जाता है। आगे जाकर खानापीना पूरी तरह बंद हो जाता है। आहार नली के कैंसर की शुरुआत खाने में तकलीफ से ही होती है।