सुरों का वारिस चौकीदारी कर पाल रहा परिवार
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सुरों का वारिस चौकीदारी कर पाल रहा परिवार

जालंधर. किसी समय में जिस लक्खी वणजारे की आवाज सुनने के लिए लोग दिन-रात का फर्क नहीं रखते थे, वही लक्खी आज दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए चौकीदारी कर रहा है और उनकी पत्नी लोगों के घरों में काम करती हैं।

lakkhi किसी समय में जब लक्खी स्टेज पर परफॉर्म करते थे तो उन पर पैसों की बरसात होती थी, लेकिन अब उन्हें सुबह होते ही परिवार के लिए शाम के खाने की चिंता सताती है और शाम को अगली सुबह की रोटी का फिक्र रहता है। किसी जमाने में देशभर में प्रसिद्धि पाने वाले ‘सुरों के वारिसों’ के लिए दैनिक भास्कर और रेडियो 94.3 माय एफएम ने चैरिटी इकट्ठी करने की जिम्मेदारी उठाई है ताकि उनकी बची हुई जिंदगी सुख और आराम से गुजर सके।

गायकी का वणजारा

अमलोह से सात किलोमीटर दूर बसे गांव लक्खा सिंह वाला का नाम विदेशों तक पहुंचाने वाले गायक लक्खी वणजारा गरीबी के दलदल में कमल बनकर खिला। लक्खी वणजारा चाहे कोके, छल्ले, चूड़ियां बेचने वाला रहा, लेकिन अपनी कला व गायकी के कारण वह गीतों का वणजारा साबित हुआ। कम पढ़ा-लिखा होने के बावजूद वह पंजाबी गायकी का चमकता सितारा बना।

लक्खी वणजारा का जन्म 1950 में हुआ। बड़ा परिवार होने के कारण वह ज्यादा पढ़ाई नहीं कर पाया। पिता बकरियां चराने का काम करते थे और जब लक्खी ने होश संभाला तो उसे काम पर लगा दिया। लक्खी ने ट्रैक्टर सीखा व तीन साल ड्राइविंग की। इसके बाद वह दानामंडी में पल्लेदारी का काम करने लगा व अपनी पांच बहनों की शादी करवाई। संगीत उन्हें विरासत में मिला। उनके दादा, पिता, चाचा अच्छे गवइये थे और कभी-कबार कव्वालियां गाने के लिए जाते थे।

लक्खी वणजारे का घर का नाम करतार सिंह था, लेकिन जब उसने कर्म सिंह अलबेला को उस्ताद बनाया तो उस्ताद ने उसका नाम लक्की वणजारा रखा जो बाद में लक्खी वणजारा हो गया। गायकी के साथ-साथ वह पल्लेदारी भी करता रहा। साथ में ड्रामा ग्रुप या मीर आलमां के साथ चला जाता। उनका मन चाहे रिकॉर्डिग के लिए बहुत करता, लेकिन गरीबी के कारण ऐसा नहीं हो पाता।

यह बात 1976 की है, एक दिन घर में लक्खी यही बैठा सोच रहा था कि उतने में रशीदा बेगम आ गई। उनको एचएमवी कंपनी ने रिकॉर्डिग करने के लिए कहा था। उसने लक्खी को कहा कि उनकीआवाज उन्हें काफी पसंद है, क्यों न इकट्ठे प्रोग्राम करें। लक्खी ने हामी भरी और अगले दिन दोनों दिल्ली के लिए रवाना हुए। लक्खी को लगा जैसे उसके सपने सच हो रहे हैं।

कंपनी ने दोनों की आवाज में रिकॉर्डिग की। पांच-छह महीने बाद लक्खी का पहला ईपी रिकॉर्ड मार्केट में आया ‘सीटी वज्जे चुबारे’ यह रिकॉर्ड इतना हिट हुआ कि पल्लेदार लक्खी, धड़ल्लेदार लक्खी बन गया। कंपनी वाले भी उसकी अगली रिकॉर्डिंग करने के लिए उतावले हो गए। डेढ़ महीने बाद लक्खी का दूसरा रिकॉर्ड ऊषा शर्मा के साथ आया। इस रिकॉर्ड के साथ उसे दिन में तीन-तीन प्रोग्राम मिलने शुरू हो गए। इसके बाद उसके दो रिकॉर्ड और आए जो काफी हिट हुए।

लक्खी का पांचवां रिकॉर्ड सांझा आया, जिसमें मोहम्मद सदीक, सुरिंदर छिंदा ने भी गाया है। इसमें लक्खी के दो गीत रशीदा बेगम के साथ थे, जिसके बोल ‘टेप रिकॉर्ड लिआदे वे पट्टी गई हाणियां’ थे। लक्खी के हिट गानों में मेरे यार दा व्याह मैनूं चढ़िया ए चाअ, तेरिया नैनां ने नागां दे पुत्त कीले, मेरी मां दा सुनेहा आया ढोलना चढ़ा दे बस वे शामिल हैं।

लक्खी की दर्जन भर कैसेट भी आईं, लेकिन माहौल बदलने के कारण वह ज्यादा नहीं चल पाईं। लक्खी आज गांव में खुद चौकीदारी कर रहा है और उनकी पत्नी लोगों के घरों में काम करती हैं। लक्खी ने दो तीन बार रेडियो पर और दूरदर्शन जालंधर पर भी गाया, लेकिन यह संस्थाएं रिकार्डिग के बदले पैसे मांगती थी, जो उन्होंने देने से मना कर दिया। वह यह शेयर हमेशा बोलता है।

ओह वी दिन सी, एह वी दिन ने, किन्ना पै गया फर्क कुड़े।

ना ओह झल्ल इश्क दा चढ़दा, ना ओह रह गई मड़क कुड़े।

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