नई दिल्ली। आर्थिक धीमेपन के दौर में भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने 2008-09 के दौरान 6.7 फीसदी की विकास दर बरकरार रखी है। यह विकास दर भी दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं के लिए सपना ही है। विकास दर बढ़ने का प्रमुख कारण सरकार की खपत में 22 फीसदी का इजाफा है।
वित्त वर्ष की पिछली तिमाही में विकास दर 5.8 फीसदी थी। उस समय दुनिया की ज्यादातर अर्थव्यवस्थाएं धीमी पड़ गई थीं। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा कि यह विकास दर उम्मीद के मुताबिक है।
पिछले वित्त वर्ष में विकास दर 9 फीसदी थी, उससे यह कम है, लेकिन यह पूर्वानुमानों से बेहतर है। रिजर्व बैंक ने विकास दर 6.5-7 फीसदी की रेंज में रहने का ही अनुमान व्यक्त किया था। चौथी तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग की प्रगति दर ऋणात्मक 1.4 फीसदी हो गई है। इसलिए जीडीपी की प्रगति दर चौथी तिमाही में 5.8 फीसदी पर आ गई थी, जो एक साल पहले 8.6 फीसदी थी। वर्ष 2008-09 की तीसरी तिमाही में जीडीपी की विकास दर 5.3 फीसदी के अनुमान से बेहतर 5.8 फीसदी रही थी।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन सुरेश तेंदुलकर ने कहा था कि बजट में विकास दर का ध्यान रखा जाएगा। क्रिसिल के प्रमुख अर्थशास्त्री डीके जोशी का कहना है कि सरकार को देखना होगा कि पिछले राहत पैकेजों का क्या असर रहा है। वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी का कहना है कि अर्थव्यवस्था को तेज विकास दर पर लाना सरकार की प्राथमिकता है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पहली तिमाही में 7.8 फीसदी, दूसरी तिमाही में 7.7 फीसदी और अगली दो तिमाहियों में 5.8 फीसदी बढ़ी हैं। अर्थशास्त्री डीके जोशी का कहना है कि सरकार की ओर से ज्यादा खर्च करने से विकास दर में सुधार आया है। जोशी का मानना है कि रिजर्व बैंक उदार नीतियों को जारी रख सकता है और रेपो दरों में कटौती कर सकता है। जबकि तेंदुलकर का ख्याल है कि नीतिगत दरों में कमी करने से अर्थव्यवस्था पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।