आपके साथ ऐसा कितनी बार हुआ है कि आपने जिस चीज को अपनी कच्ची उम्र में महज एक खेल समझा हो और आगे चलकर पता चला हो कि वह दरअसल दुनिया का सच था? मेरे साथ तो कच्ची उम्र से लेकर इस पकी उम्र तक कमोबेश ऐसा होता ही रहा है। और कहूं तो अब भी हो रहा है और इंशा अल्ला होता ही रहेगा। आख़िर को कैरेक्टर भी कोई चीज होती है।
ऐसे ही बचपन में एक गीत सुना था ‘दुनिया, ये दुनिया, तूफ़ान मेल’। हम मोहल्ले के छह-आठ बच्चों ने एक-दूसरे के पीछे लगकर, आगे वाले की शर्ट पकड़कर, इंजन बने बच्चे की छुक-छुक और सीटी पर बीच-बीच में ‘तूफ़ान मेल’ कहकर इसे भी खेल में बदल दिया। इन दो लफ्जों ‘तूफ़ान मेल’ और उसके बाद की सीटी ने दिल-दिमाग़ को उस व़क्त ऐसा झंकृत किया कि पूछिए मत। हालत यह थी कि इस गीत के आगे के अंतरों में से एक भी लाइन न याद थी और न याद करने की कोशिश ही की।
होश वालों की इस दुनिया में व़क्त ने कस-कस के ऐसे थपेड़े मारे कि इस तूफ़ान मेल के सारे लफ्ज न सिर्फ़ समझ आने लगे, बल्कि ऐसे याद हुए हैं कि भूले नहीं भूलते। बल्कि मुझे लगता है कि आप सब भी इसे नहीं भूल पाएंगे। जिनने कानन देवी का गाया यह अद्भुत गीत सुना है, वो मेरी इस बात की ताईद करेंगे। जिनने नहीं सुना है, ख़ुदा के वास्ते फ़ौरन सुन लें। सन् 1942 की फिल्म ‘जवाब’ के इस गीत के रचयिता हैं पंडित मधुर और संगीतकार हैं कमल दास गुप्ता।
अब जरा इस पूरे गीत को सुनिए और गुनिए कि पार्टी (गीतकार) ने क्या पते की बात कह दी है-
तूफ़ान मेल
दुनिया, ये दुनिया.. तूफ़ान मेल
इसके पहिए जोर से चलते
और अपना रस्ता तय करते
सयाने इससे काम निकालें
बच्चे समझें खेल
तूफ़ान मेल..
जरा ग़ौर फ़रमाइए, ‘सयाने इससे काम निकालें, बच्चे समझें खेल’। अब आप इन दो में से किस श्रेणी में आते हैं, आप सोचें। मुझे अपना पता है, पर इस उम्र में बताते हुए शर्म आ रही है। अब यार समझो न! अब इतने दिन से तो जानते ही हो। हां!
कोई कहीं का टिकट कटाता
इक है आता इक है जाता
सभी मुसाफ़िर.. बिछड़ जाएंगे
पल भर का है खेल
तूफ़ान मेल..
अब बोलिए क्या करूं। सिर्फ़ रोऊं या जोर-जोर से दहाड़ें मारूं? एक साथ कितने बिछड़े चेहरे नजर के सामने आ गए। उफ्! पल भर का यह खेल। इस पल भर में ख़त्म होने वाले सफ़र के दौरान ही फिल्म किस तेजी से घूम जाती है। जब तक किसी चेहरे को पहचान पाओ, तब तक आपका अपना खेल खल्लास। और हां, आख़िर में एक और पते की बात कहता है कवि-
जो जितनी पूंजी हैं रखते
उसी मुताबिक सफ़र वो करते
जीवन का है भेद बताती
ज्ञानी को ये रेल
तूफ़ान मेल..
वाह! कानन देवी, वाह! वाह! पंडित मधुर और कमल दास गुप्ता। क्या चीज सुनाई है। कंब़ख्त समझने में ही 50 साल लग गए। अपनी खोपड़ी तो इंडियन रेलगाड़ी से भी ज्यादा लेट चलती है।
वह थी कानन बाला
मैं कानन देवी की कहानी कहूं, उससे पहले एक बात उनके बारे में कह दूं। 1916 के अविभाजित बंगाल में जब वे इस दुनिया में आईं, तो उन्हें यह नहीं मालूम था कि इस तूफ़ान मेलनुमा दुनिया में उनका सफ़र बिना टिकट शुरू हो रहा है। आंख खुली, तो घर में चारों ओर ग़रीबी पैर पसारे बैठी थी। रोटी के सपने भर थे और सर पर नाजायज औलाद का ठप्पा था। इस घर में रोटी आती भी, तो उस आने वाली हर रोटी पर लिखी होती शर्म और ग़ैरत की कोई कहानी।
परेशानियों की तपन से सुलगते इस घर में संगीत की स्वर लहरियां ठंडी बयार की तरह बहती रहतीं और जिंदागी की बेरहमी को ठेंगा दिखाती रहती थीं।
समाज के ऐसे लाचार और मजबूर परिवारों के लिए न जाने कैसे और कहां से हमदर्द भी आ जाते हैं। कभी फ़रेबी और कभी हक़ीक़ी। ऐसे ही एक हक़ीक़ी हमदर्द ने 10 साल की बच्ची कानन को मदान थिएटर्स की बांगला फिल्म ‘जोयदेव’ (1926) में कृष्ण की भूमिका दिला दी। अगले साल एक छोटी-सी भूमिका और मिली, धीरेंद्रनाथ गांगुली की फिल्म ‘शंकराचार्य’ मंे, मगर इसके बाद फिर चार साल पूरी तरह ख़ामोशी छाई रहीं।
1931 में गूंगा सिनेमा बोल पड़ा था। चारों ओर इस नाचते-गाते सिनेमा को लेकर उत्सव का माहौल था। इस उत्सव से अब तक उपेक्षित कानन दासी से कानन बाला का घर भी अछूता न रहा। ‘जोयदेव’ के निर्देशक ज्योतिष बैनर्जी को अचानक उस दुबली-पतली, मगर ख़ूबसूरती से लबरें कानन की याद आई। इस याद का नतीजा था कानन के अनोखे और ऐतिहासिक फिल्मी सफ़र का आग़ाज। पहली फिल्म ‘रिशिर प्रेम’। इसी साल दूसरी फिल्म ‘जोरे बोरात’। अब तूफ़ान मेल चल पड़ी थी।
बंगाल में फैला जादू, हिंदुस्तान में फैल गया। कानन बांगला फिल्मों से हिंदी फिल्मों में आ पहुंचीं। ‘चार दरवेश’ (1933), ‘हरि भक्ति’ और ‘ख़ूनी कौन’ (1934) से चलकर बात पी.सी. बरुआ के साथ फिल्म ‘मुक्ति’ (1937) तक आ पहुंची। इसी फिल्म के साथ कानन का सफ़र, राधा फिल्म्स के अनुबंध से मुक्त होकर उस दौर की सबसे बड़ी फिल्म कंपनी ‘न्यू थिएटर्स’ के साथ आगे बढ़ा।
‘मुक्ति’ ने कानन देवी को आसमान की ऊंचाई तक पहुंचा दिया। पंकज मलिक और आर.सी. बोराल के संगीत में उनके गाए गीत ‘सांवरिया मन भाया रे, आंख से मन में समाया रे’, ‘कैसा उजड़ा चमन ख़ुशी का, कैसा नसीबा फूट गया’ काफी लोकप्रिय हुए। यहां तक आते-आते ही उसने अपनी सुरीली आवाज और अनोखे अंदाज वाले अभिनय से ‘बाला’ से ‘देवी’ की पद-प्रतिष्ठा पा ली थी। अगले साल इस शान में सलमा-सितारे और लग गए, जब कानन उस दौर के महान गायक-नायक के.एल. सहगल के साथ फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ मंे उनकी हीरोइन बनकर आईं।
इस फिल्म में कानन ने सहगल साहब के साथ एक हास्य गीत ‘लो खा लो मैडम खाना’ के अलावा 6 गीत और भी गाए हैं। सहगल का गाया ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए’ भी इसी फिल्म में है। यहां बताने वाली एक बात और भी है। वह यह कि कानन को सहगल के साथ काम का अवसर न्यू थियेटर्स की तरफ़ से पहले भी मिला था, मगर वे उसका लाभ न उठा सकीं। 1935 में फिल्म ‘देवदास’ में निर्देशक पी.सी. बरुआ ने उन्हें सहगल के साथ पारो की भूमिका में लेना चाहा, मगर उस व़क्त वे राधा फिल्म्स के अनुबंध में होने की वजह से यह भूमिका न कर पाईं। आख़िर वह भूमिका अभिनेत्री जमुना के हिस्से में गई।
यह वह दौर था, जब नायक-नायिका के लिए पर्दे के पीछे से गाने वाले पाश्र्व गायकों का ज़माना अभी पूरी तरह नहीं आया था। कानन देवी ने सबसे पहले 1929 में काज़ी नज़रुल इस्लाम जैसी महान हस्ती के साथ मेगाफोन के लिए बांगला गीत रिकार्ड कराए। बाद में उस्ताद अल्लारखा, भीष्मदेव चैटर्जी जैसे लोगों की संगत में अपने गले की आवाज़ को अपने चेहरे की ख़ूबसूरती के भी ऊपर जगह दिला दी थी। 1941 में रिलीज हुई फिल्म ‘जवाब’ के गीतों ने ऐसी धूम मचाई कि आज तक उसकी गूंज बाक़ी है।
पंडित मधुर के गीत और संगीतकार कमल दास गुप्ता की अद्भुत रचनाओं को कानन देवी की आवाज़ ने अमर बना दिया। सबसे पहले तो वही ‘तूफ़ान मेल’, उसके बाद फिर याद कीजिए ‘ऐ चांद छुप न जाना’, ‘कुछ याद रहे तो सुनकर जा, तू हां कर या ना कर जा’ और असित बरन के साथ वाला डुएट ‘दूर देस के रहने वाला, आया, आया देस पराए’।
इन गीतों से पहले और बाद में भी कानन देवी के गाए अद्भुत गीत हैं। जैसे घुमी खान के साथ ‘अम्बवा की डाली, डाली झूम रही है आली/मैं पी कर मद की प्याली यूं चाल चलूं मतवाली’, ‘डोले, डोले हृदय की नैया’ (विद्यापति 1937), ‘लूट लियो मन धीर’ और ‘चली पवन हर सू, लहक रही सरसों’ (जवानी की रीत 1939), ‘प्रभू जी, प्रभू जी, तुम राखो लाज हमारी’, ‘मेरी मजबूरियों ने मेरा दामन चाक कर डाला’ और ‘जरा नैनो से नैना मिलाय जयो रे, ओ मोरे बांके रसीले सांवरिया’ (हास्पीटल 1943)।
1941 में न्यू थियेटर्स से अलग होकर कुछ साल तक फिल्मों में काम करती रहीं, मगर 1959 में उन्होंने अपने अभिनय के सफ़र को रोक दिया। कानन का टिकट इस स्टेशन से बहुत आगे तक के लिए वैध था, मगर जिंदगी की तल्ख़ सच्चइयों ने बीच राह आवाज़ देकर उतार लिया। इससे पहले उन्होंने इतना ज़रूर किया कि ‘श्रीमती पिक्चर्स’ के बैनर में फिल्मों का निर्माण शुरू किया। अपने पति हरिदास भट्टाचार्य को निदेशक बनाया और समय आने पर ख़ुद को, अपने धन को समाज सेवा, उसमें भी ख़ासकर महिलाओं के लिए समर्पित कर दिया।
1968 में पद्मश्री, 1976 में दादा फालके अवार्ड में सम्मानित हुईं। 76 साल की उम्र में 17 जुलाई 1992 को इस दुनिया के बाद के सफ़र को निकल पड़ीं। मुझे पता नहीं है कि यह सफ़र भी तूफ़ान मेल जैसा है या फिर सफ़र में सबको एक ही जगह के टिकट मिलते हैं।
और. 1973 में कानन देवी ने बांगला भाषा में अपनी आत्मकथा ‘सबारे आमी नोमी’ प्रकाशित की है। इस आत्मकथा में उन्होंने काफी साफ़गोई में अपने जीवन की कहानी बताई है। मगर कुछ लोगों के फ़रेब से वे इतनी आहत थीं कि उन्होंने उस पूरे दौर को ही ग़ायब कर दिया है। इन लोगों में एक है गीतकार-संगीतकार हीरेन बोस। अपने शुरुआती दौर में कानन ने इस व्यक्ति पर इतना भरोसा किया कि उसके सारे फ़ैसले वही करता था और फिर जैसे अक्सर होता है..एक दिन पंछी दाना लेकर उड़ गया, कानन अकेली आगे बढ़ीं और आज लोगों को कानन याद है.. हीरेन बोस को तो हम जैसे लोग याद कर लेते हैं। वह भी इसलिए कि दग़ाबाज़ों का दग़ा भी दर्ज होना जरूरी है।
तो मित्रो, ऐसी थीं कानन देवी, जो मेरे लिए ‘तूफ़ान मेल’ की पहेली छोड़ गई थीं। अब जब कुछ-कुछ समझा हूं, तो बैठा चेक कर रहा हूं, मेरा टिकट कहां तक का है। हुं..हां-हां, अभी टिकट वेलिड है। सो अपना सफ़र भी जारी है। अगले ह़फ्ते फिर से मिलते हैं। करते हैं अपनी आपस की बात।
जय-जय।