संडे स्‍पेशल: ‘..रुकावट के लिए खेद है’
भास्‍कर रसरंग Sunday, June 14, 2009 12:44 [IST]  

Raj Kumar Keswani Jiदोस्तो, आज न जाने क्यों यह जुमला बार-बार मेरे कानों में गूंज रहा है- ‘रुकावट के लिए खेद है’। याद आया हमारे अपने, प्यारे दूरदर्शन के पर्दे पर बार-बार उभरने वाला जुमला? 80 के दशक में हिंदुस्तान के हर ख़ास-ओ-आम की जिंदगी में एक अजीब-सा बदलाव लाने वाले दूरदर्शन ने उस दौर में जो-जो कारनामे अपनी रुकावट के लिए लगातार खेद प्रकट करते हुए अंजाम दिए, उन्हें याद करता हूं, तो जी चाहता है कि कह दूं- ‘अस्वीकार है आपका यह खेद!’ सारे देश की जनता को निजी टीवी चैनल्स के हवाले करने के लिए किसी खेद को स्वीकार किया भी नहीं जाना चाहिए।

15 अगस्त 1982 को जब दूरदर्शन ने अपने रंगीन रूप में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के भाषण के साथ देश भर के घरों में दस्तक दी, तो लोगों ने अपनी जरुरतों को काट-काट कर टीवी सेट नकद, उधार या फिर किस्तों पर ख़रीद कर इस नए चमत्कार का पुरजोर स्वागत किया। जो नहीं ख़रीद पाए, उन्होंने पड़ोसियों के घर में हाथ जोड़ कर ही सही, इस अजूबे को देखा। और दूरदर्शन ने भी किसी को नाउम्मीद नहीं किया। हल्के-फुल्के मनोरंजन से लेकर बुद्धिजीवी वर्ग तक के लिए ऐसे-ऐसे अनोखे प्रोग्राम पेश किए कि घर के मालिक और नौकर के बीच की दूरी ही मिट गई। दोनों को दूरदर्शन ही देखना था।

जरा याद कीजिए 1984 में घर-घर की पसंद बना हिंदुस्तान का पहला सिटकाम कॉमेडी शो ‘यह जो है जिंदगी’। विख्यात व्यंग्यकार शरद जोशी की अद्भुत कथा और चुटीले संवादों से करोड़ों लोगों को एक साथ हंसाता-गुदगुदाता शो। इसी साल फिर मनोहर श्याम जोशी की रचना ‘हम लोग’।

इसके बाद तो एक के बाद एक क़तार लग गई- ‘बुनियाद’ (1986), ‘रामायण’ (1987-88), ‘महाभारत’ (1989-90), ‘नुक्कड़’ (1986-87), ‘भारत एक खोज’, ‘मालगुड़ी डेज’ (1987), पंकज कपूर का ‘करमचंद’ और ‘फटीचर’, ‘गुल-गुलशन-गुलफाम’, ‘वागले की दुनिया’, शाहरुख़ खा़न का पहला सीरियल ‘फौजी’, फिर ‘सर्कस’, हेमा मालिनी का ‘नूपुर’, गुलजार का यादगार शाहकार ‘मिर्जा ग़ालिब’, गोविंद निहलानी का ‘तमस’, ‘उड़ान’, ‘चंद्रकांता’, ‘चाणक्य’, ‘मृगनयनी’ और अनेक ऐसे नाम, जो यहां लिए जाएं, तो सारी बात उसी पर ख़त्म हो जाए। वाह भाई वाह!

अच्छा हां, इन सीरियल्स से हटकर ‘चित्रहार’, ‘रंगोली’, ‘सुरभि’ जैसे अत्यंत लोकप्रिय और मनोरंजक प्रोग्राम्स अलग से। इन सारी बातों को कई बरस गुजर गए। अनगिनत निजी चैनल्स ने ख़ूब नाम और दाम कमाया। एकता कपूर और न जाने कौन-कौन, क्या-क्या शोज बना रहे हैं, मगर इतने सारे बरसों में किसी भी चैनल ने आज तक इतनी बड़ी लागत का कोई ऐसा सीरियल नहीं बनाया, जिसके शो टाइम पर शहर में कफ्र्यू का-सा सन्नाटा पसर जाए। आपको याद होगा, ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के समय देश भर में यही मंजर आम था।

यही फ़र्क़ है जनता के पैसे से चलने वाले किसी काम में और दौलत के लिए होने वाले काम में। हां, इसकी भी एक शर्त है- जनता के लिए काम करने वाले अफ़सर अपनी बजाय अपने दर्शक के प्रति ईमानदार हों। सौभाग्य से उस दौर के कुछ अधिकारी इसी श्रेणी में से थे, जिन्होंने एक कभी न भुलाए जा सकने वाले इतिहास का निर्माण किया।

कहते हैं कि इतिहास ख़ुद को दोहराता है, मगर मुझे लगता है कि सरकारी तंत्र के जाले में उलझा इतिहास इस घड़ी थका-हारा अपने दोहराए जाने का इंतजार भर ही कर रहा है। मुझे न जाने क्यों लगता है किसी दिन मैं ही जाकर दूरदर्शन के किसी कैमरे के आगे एक त़ख्ती टांग आऊं, जिस पर लिखा हो -व्यवस्था में छेद है। रुकावट के लिए खेद है।

सृष्टि से पहले सत नहीं था : श्याम बेनेगल के महान निर्माण ‘भारत एक खोज’ की शुरुआत में संस्कृत के वेद आधारित श्लोकों से रचा गया गीत समूह स्वरों में गूंजता था। था क्या, अब भी कानों में गूंज रहा है। यह स्वार मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति को दो घड़ी के लिए उसके मानसिक, नैतिक और दैहिक स्तर से कुछ ऊंचा उठा देता है। जरा याद करें:

सृष्टि से पहले सत नहीं था

असत भी नहीं

अंतरिक्ष भी नहीं

आकाश भी नहीं था

छिपा था क्या कहां

किसने ढका था उस पल को

अगम अतल जल भी कहां था

सृष्टि का कौन है कर्ता

कर्ता है वह अकर्ता

ऊंचे आकाश में रहता

सदा अध्यक्ष बना रहता

वही सचमुच में जानता

या नहीं भी जानता

है किसी को नहीं पता

वो था हिरण्यगर्भ सृष्टि से पहले विद्यमान

वही तो सारी भूत जाति का स्वामी महान

जो है अस्तित्ववान

धरती आसमान धारण कर

ऐसे किसी देवता की उपासना करें हम

हवि देकर

जिस के बल पर तेजोमय है अंबर

पृथ्वी हरी-भरी, स्थापित, स्थिर,

स्वर्ग और सूरज भी स्थिर

ऐसे किसी देवता की उपासना करें हम

हवि देकर

गर्भ में अपने अग्नि धारण कर पैदा कर

व्यापा था जल इधर-उधर, नीचे-ऊपर

जगा चुके व एकमेव प्राण बनकर

ऐसे किसी देवता की उपासना करें हम

हवि देकर

ऊं! सृष्टि निर्माता, स्वर्ग रचयिता, पूर्वज रक्षा कर

सत्य धर्म पालक अतुल जल नियामक रक्षा कर

फैली हैं दिशाएं बाहु जैसी उसकी सब में सब कर

ऐसे ही देवता की उपासना करें हम हवि देकर

इस महान सीरियल का, जो कि पंडित जवाहरलाल नेहरू की उतनी ही महान इतिहास शोधक पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ पर आधारित था, एक-एक एपिसोड दुनिया के हर शिक्षित और अशिक्षित व्यक्ति के लिए आज भी एक अद्भुत ज्ञानवर्धक अनुभव हो सकता है। चाहे वे ऋगवेद काल की बात करते एपिसोड हों, जाति और वर्ण व्यवस्था वाले एपिसोड हों, रामायण और महाभारत की व्याख्या करते अंश अथवा चाणक्य और चंद्रगुप्त से लेकर देश के बंटवारे तक के एपिसोड हों, ये सारे के सारे इतिहास को जीवंत कर देने वाले 53 भाग थे। भारतीय टेलीविज़न के इतिहास में फिर कोई ऐसा काम अब तक नहीं हुआ है।

इसी तरह था हर रोज़ टेलीकास्ट होने वाला ‘हम लोग’। देश के एक मध्यमवर्गीय परिवार के बहाने समाज की परतें उधेड़ता यह सीरियल घर-घर में इसके पात्रों के नाम के साथ प्रवेश कर गया था। किसी घर में किसी को लल्लू जी घोषित कर दिया गया था, तो कहीं कोई मंझली और छुटकी हो गई थी। कई नशेले अपने नाम की बजाय बसेसर राम के नाम से पहचाने जाने लगे थे।

पंकज कपूर ने जासूसी सीरियल ‘करमचंद’ में गाजर क्या खाई कि उस व़क्त गाजर खाना भी एक फैशन बन गया। और किसी ने किसी को ‘शट अप’ कहा, तो फौरन किट्टी की याद आ जाती थी। रमेश सिप्पी निर्देशित ‘बुनियाद’ के हवेलीराम और लाजो जी की बुढ़ापे की चुहलबाज़ियों को कौन भूल सकता है। ‘फौजी’ का डायलाग ‘..आइ से चैप्स’ और ‘यह जो है ज़िंदगी’ में सतीश शाह का संवाद ‘..थटी (थर्टी नहीं) यीअर्स का एक्स्पीरियंस है’ आज भी गुदगुदा जाते हैं। प्रकाश झा के ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ में रघुवीर यादव ने ऐसे सपने देखे कि वह अब भी मुंगेरीलाल ही लगता है।

Doordarshan Logoबात ज़रा लंबी है, सो अपनी सीमा में रहते हुए इसे यहीं ख़त्म करता हूं। मैंने तो बस एक खोई हुई ख़ूबसूरत चीज़ को याद भर किया है। आपकी अपनी यादें भी कम न होंगी। सो बाक़ी कुछ आप भी याद कर लें। उसका रस लें। ऐसा ही तो हमारा-आपका रिश्ता है न। बात मैं छेड़ूं, पूरी आप करें। अच्छा, एक बात और। अगर आप मुझसे सहमत हों, तो आप भी दुआ करें कि किसी दिन दूरदर्शन की यह ‘रुकावट’ ख़त्म हो।

और..

एक ज़रा प्राइवेट में बात भी करनी है। बात ऐसी है कि मेरी बातें सुनने वाले ढेर सारे दोस्त मुझे फिल्मी दुनिया का कोई बहुत पहुंच वाला आदमी मानकर मदद या मार्गदर्शन मांगते हैं। किसी ने फिल्मों के लिए सैकड़ों कहानियां लिख रखी हैं, किसी ने हज़ारों गीत। इन सब दोस्तों को इस मायानगरी में घुसने के लिए किसी जादू की कुंजी की तलाश है। मैं साफ़ कर दूं, मेरे पास सिर्फ़ बातें हैं, पहुंच नहीं। मेरी पहुंच सिर्फ़ आप तक है। बस।

जाते-जाते एक बात और कह दूं। ‘आपस की बात’ के सिनेमा और संगीत से संबंधित लेखों के संग्रह वाली पुस्तक, जिसकी आप लोग बार-बार मुझे याद दिलाते रहे हैं, अगले महीने प्रकाशित हो रही है। सो आपको ख़बर कर दी। अब चलूं। बहुत काम बाक़ी है। सच्ची। बातों के अलावा ज़िंदगी में और भी बहुत काम हैं। जहां तक बात रही अपनी ‘आपस की बात’ की, तो लीजिए अगले ह़फ्ते फिर हाज़िर हुआ जाता हूं। तब तक.. जय-जय।

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Comments
husain
Sunday, 14th Jun 2009, 15:27
aaj bahot aacha lagaa etihas kii bate pahr kar poranii yade tazha ho gahii merii omr 27 saal he merii yaddhs bhot aachii he es liye me durdarsn ko kabhii nahi bhol saktaa aaj bhii zahen me aaj bhii sab khoca eskaa ash hii he me duaa kartaa ho ke durdarsn jald hii hamri zendgii me rokwat ke liye khed he aae beyyyyyyyyyyyyy
Raj Swami
Thursday, 20th Aug 2009, 15:34
Aaj bhut saalo baad ye sab pedhkar bhut acha lega aisa lega mano hum apne purane time main wapas chele gaye meri umer 28 yrs h uss time ka to koi jwab bhi nahie tha jab t.v per Ramayan ko dhkne puri colony ke log aa jate they.pta nahie kyo durdarshan ka name aate hi dil ki dhadkan c badhne leg jaati h wo bachpan ki saari baate apne aap yaad aane legti h ok thanks aapne itne kuch likha. pls tell me kya humari aane wali generation bhi doordarshan ke baare main jaan skengi or kya ye sebhi serial phir se dhekne ka moka mil sekta h ok thanks n bye



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