घर हो या रेस्तरां, दफ्तर हो या होटल या फिर सिनेमाघर। बगीचा हो, चाहे लिफ्ट। बस, रेल या फिर घोड़े-गधे, गाय की पूंछ। नन्ही-सी मक्खी हर कहीं डटी रहती है। आइए, मक्खी के बारे में कुछ जानकारी हासिल कर लेते हैं..
अंतरिक्ष यान तक में भी मक्खी की घुसपैठ रोकना मुश्किल होता है। सोयूज टी 12 नामक यान में बैठकर मक्खियों के अंतरिक्ष में पहुंचने की खबर सुर्खियों में रही थी। एरोप्लेन और शिप में जबरन प्रवेश कर उसने अनेक देशों में अपना घर बना लिया। उसे किसी पासपोर्ट अथवा टिकट की परवाह नहीं है।
बोलचाल में डटी -
हमारी Êिांदगी में मक्खी न चाहने पर भी शामिल है। बोलचाल में भी उसने जगह बना ली है- मक्खीचूस, शब्द ऐसे व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता है, जो बहुत कंजूस हो। मक्खी मारना, निठल्लेपन का पर्याय है। नाक पर मक्खी बैठना, परेशानी के बने रहने का सूचक है।
मक्खी बहुत ही फुर्तीली और सक्रिय होती है। पलक झपकते उड़ जाना, दाएं-बाएं, ऊपर-नीचे, सीधे और एकाएक मुड़कर वापस आ जाना उसकी फितरत है। हमारी नÊार में भले वह गंदगी पसंद हो, पर उसे अक्सर अपने नन्हे-नन्हे पैरों से शरीर को साफ करते देखा जा सकता है।
कई चरणों में बनती
अंडे से बाहर निकलने से मक्खी बनने का चक्र सात से दस दिनों में पूरा हो जाता है। इसी अवस्था में मादा प्रजनन योग्य हो जाती है। एक बार में वह किसी गंदे स्थान पर सौ से डेढ़ सौ तक बहुत छोटे-छोटे अंडे देती है, जिनका रंग सफेद और आकार गोल होता है। अंडे से मक्खी बनने के तीन मुख्य कारण होते हैं।
लार्वा के रूप में दूसरे कई कीटों की तरह उसे भी खूब भूख लगती है। वह आस-पास की वनस्पति और केंचुओं, घोंघों, चींटियों आदि को भी चटकर जाती है। बाद में उनकी भूख घटती रहती है। मेफ्लाई नामक मक्खी तो युवा होते ही खाना छोड़ देती है।
किशोरावस्था तक खाया आहार ही उसके लिए पर्याप्त होता है। अंडा देने के बाद उसकी मृत्यु हो जाती है। लार्वा के बाद की अवस्था प्यूपा में वह अपना खोल दो बार बदलती है और पूर्ण मक्खी बन जाती है।
मानव जैसा दिमाग
लगभग आधा सेंटीमीटर लंबी सामान्य मक्खी इतनी हल्की होती है कि एक किलो के लिए करीब दो लाख मक्खियों को पकड़ना होगा। उसका दिमाग भी इतना हल्का होता है कि एक ओंस यानी करीब आधा छटांक मस्तिष्क के लिए पौने तीन करोड़ से अधिक मक्खियों की Êारूरत पड़ेगी।
एक चिकित्सक के अनुसार मक्खी का मस्तिष्क बहुत कुछ मानव के समान ही होता है। वे उसके सूक्ष्मतम मस्तिष्क का ऑपरेशन भी कर चुके हैं। उनका यह भी कहना है कि मक्खी को काफी-कुछ याद रहता है, पर दो-तीन मिनट तक ही।
कैसे चलती है छत पर
घरेलू मक्खी का वैज्ञानिक नाम मस्कारी बुलो है। सामान्यत: भूरे, काले रंग की इस मक्खी का निचला हिस्सा पीला होता है। उसका खून रंगहीन होता है और उसका शरीर प्रोटीन, काइटिन आदि से बना होता है। उसकी पीठ पर चार लंबी धारियां होती हैं।
मक्खी को छत पर बैठे या चलते देख हमें आश्चर्य होता है कि वह गिरती क्यों नहीं, सपाट छत पर सरपट कैसे भाग लेती है अथवा उल्टी कैसे टिकी रहती है? दरअसल उसके छह पैरों में दो नाखूनों के बीच जो रोंएदार गद्दियां होती हैं, उनमें से निकलने वाला चिपचिपा पदार्थ उसे छत अथवा दीवार पर चिपकाए रखता है।
उसके पैर स्पर्श इंद्रियों का काम करते हैं। आहार आदि के स्वाद का आकलन वह उन्हीं से करती है। जिस नलिका से वह भोजन चूसती है, उसे रोस्ट्रम कहते हैं।
अनेक रोगों की वाहक
वह दिखने में भले ही नन्ही और पिद्दी सी हो, पर हमारे लिए खतरनाक और नुकसानदेह है। उसके पैरों के चिपचिपे पदार्थ में विभिन्न बीमारियों के करीब साढ़े बारह लाख कीटाणु सवार हो जाते हैं। ये खतरनाक जीवाणु एक जगह से दूसरी जगह पहुंचकर
संक्रमण फैलाते हैं। मानव समुदाय मक्खियों की वजह से ही डिफ्थीरिया, डायरिया, टायफॉइड, स्मॉल पॉक्स, टीबी, कॉलरा, पोलियो, मेनिनजाइटिस, दस्त, हैजा, कोढ़ आदि के साथ आंखों के रोग ट्रैकोमा जैसे अनगिनत रोगों का शिकार होता है।
मददगार मक्खी
पर मक्खी की सभी प्रजातियां मनुष्य के लिए हानिकारक नहीं होतीं। इकन्यूमन प्रजाति की मक्खी नुकसानदेह कीड़ों के अंडों से निकले लार्वाओं के पास अंडे देती है। जब उसके अंडों से लार्वा निकलते हैं, तो वे शत्रु लार्वाओं पर धावा बोल देते हैं। इस तरह वे हमारे लिए घातक कीड़ों की तादाद बढ़ने से रोकती है।
तीन आंखोंवाली
घरेलू मक्खी का शरीर मुख्यत: सिर, वक्ष और पेट में बंटा रहता है। वक्ष से ही उसके पैर और पंख जुड़े रहते हैं। वह अपने सिर को जब चाहे, जैसे चाहे घुमा-फिरा सकती है। शरीर के अनुपात में उसकी लाल आंखें कुछ बड़ी दिखती हैं।
उसकी अनोखी और पैनी आंखों में छह कोण वाले लेंसों की संख्या चार हÊार है। हर लेंस स्वतंत्र रूप से कार्य करने की क्षमता रखता है। वह बगैर हिले-डुले चारों तरफ ही नहीं, ऊपर-नीचे भी देख सकती है। उसे किसी भी वस्तु, आकृति के हÊारों बिम्ब दिखते हैं, पर धुंधले।
उसकी तीसरी आंख देखने के बजाए महसूस करने का अधिक काम करती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि मक्खी एक सेकंड में दो सौ आकृतियां देख सकती है, जबकि हमारा मस्तिष्क उतनी देर में सिर्फ 24 तस्वीर रिकॉर्ड कर पाता है।
शत्रुओं की कमी नहीं
सामान्यत: मक्खी की आयु दो से नौ-दस हफ्ते ही रहती है। शीत ऋतु की ठंड उन्हें सहन नहीं होती, इसलिए उन दिनों वे और भी जल्दी मर जाती हैं। यही वजह है कि कड़ाके की सर्दी में वह नÊार नहीं आतीं। बहुत अधिक गर्मी भी उसके लिए जानलेवा होती है। 33-34 डिग्री सेल्सियस तापमान मक्खियों के लिए सही रहता है।
रात में यह हमारी तरह विश्राम करती है और दिन निकलते ही घूमने-फिरने, खान-पीने और भिन-भिन कर दूसरों को सताने का मÊा लेती है। छिपकली, गिरगिट, मेंढक, सांप, मांसाहारी पक्षी मक्खी को गड़प कर खा जाते हैं।
महक से होती मूर्छित
साफ-सुथरी जगह या महक से उन्हें तकलीफ पहुंचती है, इसीलिए वे स्वच्छ, सुगंधित वातावरण से दूर भागती हैं। ऐसे माहौल में यदि दो क्षण भी रुक गई, तो मक्खी पर बेहोशी छा जाती है और याद्दाश्त कमÊाोर हो जाती है।
तेजी से फड़फड़ाते पंख
विशेषज्ञों का मत है कि मक्खी एक सेकंड में 200 से 330 बार अपने पंख हिला सकती है। साधारणत: मक्खी एक घंटे में 7-8 किलोमीटर की दूरी तय कर लेती है।
सूंडनुमा नली
मक्खी का मुंह नीचे से चौड़ा और ऊपर से संकरा होता है। इस सूंडनुमा नली के निचले हिस्से में होंठ और दांत भी होते हैं। सूखे, ठोस आहार को यह अपनी लार यानी थूक से नर्म, मुलायम बना लेती है।
मक्खी की स्वाद ग्रंथि - पैरों में होती है।
शक्कर के स्वाद के प्रति ये - मनुष्य की जीभ से
10 मिलियन (1 मिलियन = 10 लाख) गुना ज्यादा संवेदनशील होती हैं।
आवास- मक्खियां अपने जन्मस्थान से 1-2 मील की दूरी पर ही अपना डेरा जमाती हैं। ये 100 से भी ज़्यादा तरह की बीमारियांे के कीटाणु फैलाने में सक्षम होती हैं।
करोड़ों वर्ष पुरानी
जीव विज्ञानियों के मुताबिक मक्खियों की हÊारों प्रजातियां-उपप्रजातियां हैं। ये करोड़ों वर्ष से पृथ्वी पर रह रही हैं। शुरूआती मक्खियों के दो नहीं, चार पंख हुआ करते थे। बाद में एक जोड़ी पंख लुप्त हो गए और ऐसे दो अंग उगे, जो उड़ते समय पिस्टन की तरह चलते हैं। उन्हीं की मदद से वह हवा के विपरीत भी तैर लेती है।
अभिनव तैलंग, भोपाल, मप्र