एक चूहा था। उसका नाम पंछी था। उसकी पूंछ दूसरे चूहों से कुछ ज्यादा ही लंबी थी। वह अपनी लंबी पूंछ को लेकर बड़ा खुश रहता। अपनी चीÊों कैसी भी हों, अपनी ही होती हैं, है न! वह अकेले में उसे निहारता रहता। मन होता, तब अकेला ही खेलता और मस्त रहता।
एक दिन वह अकेले खेलते-खेलते ऊब गया। वह दूसरे चूहों के पास गया, जो कि उस वक्त गुलाम-लाकड़ी खेल में मस्ताने हो रहे थे। वह उनके पास जाकर उछल-उछलकर बोला, ‘ऊर्र्र्र आज से मैं भी तुम्हारे साथ खेला करूंगा। खूब हेला करूंगा। अरे बड़े मÊो आएंगे। खेलकर तो देखो।’
चूहे उसके पास आए। भरोसी सुलप्या चूहा बोला, ‘लेकिन हम तो तुम्हें खिला ही नहीं रहे हैं पंछी।’ पंछी चूहा बोला, ‘क्यों?’ उत्तर हैलीकॉप्टर चूहे ने दिया, ‘क्योंकि तुम्हारी पूंछ है लंबी।’ सारे चूहे हल्ला मचा-मचाकर गाने लगे -
‘नया कुआं की पगडंडी,
पंछी की पूंछ भारी लंबी।
या पूंछ बड़ी तेरी भईया,
जैसे तो कोई बेलड़िया।
को खेलां जी को खेला,
हम तो थारै लारै को खेलां।’
पंछी चूहे ने कहा, ‘मगर मैं इसका क्या कर सकता हूं?’
‘तुम इसे कटा सकते हो,’ रावणहत्था चूहा बोला। सभी चूहे एकसाथ बोले, ‘अभी इसी वक्त खाती के पास जाओ। पूंछ कटाकर आओ।’ चूहा गया खाती के पास। पूंछ को खाती के वसूले के आगे करके बोला, ‘उड़ा दो इसे।’ वह इतनी जल्दबाÊाी में था कि खाती से नए दिन का नमस्कार करना भी भूल गया।
खाती बोला, ‘अरे मेरा तो काम ही काटने-फांसने
का है, पर एक तो मैं किसी की मूंछ नहीं काटता। दूसरे मैं किसी की पूंछ नहीं काटता।’
चूहा फिर दोस्तों के पास गया, बोला, ‘खाती ने कहा है वह सब चीÊा काट सकता है, पर दो चीÊों नहीं काट सकता - एक तो किसी की मूंछ, दूसरी किसी की पूंछ।’ चूहे उसके लिए उत्तर बनाकर तैयार बैठे थे। लूपर चूहा बोला, ‘तो लुहार से कटा लाओ।’
लाचार क्या न करे? गया बेचारा लुहार के पास। लुहार और चूहे के बीच कुछ ऐसी हुई बात, ‘सुन, लुहार लंबी मूंछ का,’ ‘कह रे लंबी पूंछ का?’
‘बैठ्यो-बैठ्यो कांई करै?’ (बैठा-बैठा क्या कर रहा है?)
‘तू तो भाया थारी कह।’ (तुम अपनी बात करो।)
‘पूंछ म्हारी काट दै।’ (पूंछ मेरी काट दो।)
‘रुपिया साढ़े पांच दै।’ (रुपए साढ़े पांच दो।)
‘रुपियाई तो है कोनी,’ (रुपए तो नहीं हैं।)
‘पूंछ भी कटै कोनी।’ (तो पूंछ भी नहीं कटेगी।)
चूहा मात खाकर दौड़ा-दौड़ा गया दोस्तों के पास। लुहार की बात बताकर बोला, ‘बताओ इसका क्या जवाब है तुम्हारे पास? ऊर्र्र्र अब तो मैं तुम्हारे साथ खेला करूंगा। खूब हेला करूंगा। अरे बड़े मÊो आएंगे। खिलाकर तो देखो।’
चूहे तो उसके लिए उत्तर बनाकर तैयार ही बैठे थे। भसोट चूहे ने कहा, ‘तो जाओ सुनार के पास। वह बड़ी बारीकी और सफाई से तुम्हारी पूंछ काट देगा।’ चूहे का मुंह सूख गया। वह थकी हुई चाल चलता हुआ सुनार को पूंछ दिखाकर बोला, ‘हटाओ इसे।
टंटा खत्म करो। कतई काम की नहीं है। काट दो।’ सुनार बोला, ‘ऐसी ही नाकाम है, तो बिल्लियों में बांट दो।’ चूहा तो बिल्ली का नाम सुनकर ही लंबी पूंछ को घसीटता हुआ भागा।
निराश चूहा अपने बिल के दरवाÊो पर जाकर खड़ा हुआ और Êाोर से चिल्लाया, ‘कोई मेरी पूंछ काटता क्यों नहीं। चूहे मुझे खिलाते नहीं। मैं क्या करूं? जाऊं किसी कुएं में जाकर गिरूं और मरूं। अब तो तभी कुछ चैन मिल सकता है।’
तभी सांवत्या मोची उधर से गुÊारा। उसने चूहे के घर में यह रोना-पुकारना सुना, तो बोला, ‘चीखता क्यों है? ला कितनी पूंछ है तेरी, मैं सबको उड़ा देता हूं।’ सांवत्या ने थैले में से रांपी निकाली और चट पूंछ उड़ा दी। कुतन्नी-सी रांपी से कुतन्न से पूंछ कट गई, तो चूहा दर्द और खुशी से चिकन्न-चिकन्न चीखा।
भिटिंग-भिटिंग कूदता दोस्तों के पास पहुंचा। चालाक चूहों ने अब भी उसके लिए नया उत्तर बना छोड़ा था, ‘यारा, तेरी पूंछ तो कुछ Êयादा ही छोटी हो गई है। हम भला किसी भी Êयादा छोटी पूंछ वाले चूहे को कैसे खिला सकते हैं? फिर भले ही वह तुम ही क्यों न हो?’ बेचारा पंछी, दूसरों के कहने में आकर अपनी लंबी पूंछ तो गंवा बैठा था, अब छोटी पूंछ को कैसे बढ़ा सकता था?