Health
थकान को हल्के में न लें
भास्कर नेटवर्क Sunday, June 28, 2009 11:23 [IST]  

जल्दी थक जाने और नियमित रूप से शरीर में थकान महसूस करने की समस्या को ‘क्रॉनिक फटिग सिंड्रोम’ कहा जाता है। आमतौर पर यह समस्या 30 वर्ष की उम्र के बाद होती है और यह पुरुषों की तुलना में स्त्रियों में अधिक देखी जाती है।

शांति को ३5 वर्ष की उम्र तक किसी प्रकार की कोई शारीरिक समस्या नहीं थी, लेकिन पिछले एक वर्ष से उन्हें नियमित थकान महसूस होने लगी। इस दौरान उन्हें ऐसा लगता कि पूरा शरीर फट रहा है, सुबह सोकर उठने पर ऐसा लगता था कि अभी तक नींद पूरी नहीं हो पाई है।

शरीर में स्फूर्ति नहीं रहती थी और दिन भर शरीर शिथिल रहता था और अंगों में दर्द महसूस होता था। इसके साथ ही उनकी याददाश्त भी कमजोर होने लगी थी। कई तरह की मेडिकल जांच कराईं पर सब रिपरेर्ट्स नॉर्मल थीं। उन्होंने अपनी इस समस्या से निजात पाने के लिए कई डॉक्टरों की सेवाएं लीं पर समाधान नहीं हो सका।

फिर फेमिली डॉक्टर की सलाह पर वे एक मनोचिकित्सक के पास गईं और तब ही उन्हें यह जानकारी हुई कि उनकी समस्या ‘क्रॉनिक फटिग सिंड्रोम’ है। इसके बाद उन्होनें डॉक्टर की सलाह के अनुरूप उपचार कराया और अब वे पूरी तरह स्वस्थ हैं।

‘क्रॉनिक फटिग सिंड्रोम’ लंबे समय तक शरीर पर काबिज रहने वाली समस्या है। आमतौर पर यह समस्या 30 वर्ष की उम्र के बाद होती है और यह पुरुषों की तुलना में स्त्रियों में अधिक देखी जाती है।

कारण

इस समस्या के उत्पन्न होने का कोई निश्चित कारण अभी तक ज्ञात नहीं हो सका है, लेकिन चिकित्सकों के अनुसार वंशानुगत अथवा पुराने वायरल इंफेक्शन इसका कारण हो सकते हैं।

लक्षण

शरीर में दर्द, थकान और आलस्य जैसी समस्या उत्पन्न हो जाती है। इसके साथ ही जोड़ों और स्नायु तंत्र में अधिक दर्द रहता है। कई बार सिर और गले में भी दर्द होने लगता है।

थोड़ा सा भी शारीरिक श्रम करने पर शरीर बहुत जल्दी थक जाता है और बैठने या लेटने की इच्छा होती है।

जल्दी नींद नहीं आती और जल्द ही व्यक्ति की नींद टूट भी जाती है।

याददाश्त शक्ति क्षीण पड़ने लगती है।

इस रोग से पीड़ित मरीज में डिप्रेसिव पर्सनालिटी तथा नकारात्मक रवैया और पेन परसेप्शन में बदलाव देखने को मिलते हैं।

उपचार

उपरोक्त समस्या के उत्पन्न होने पर पूरी मेडिकल जांच कराई जानी चाहिए।

हाइपोथाइरॉयडिज्म, एड्स, वायल इंफेक्शन, मल्टिपल स्कलेरोसिस, ऐनेमिया बी-12, डेफिशिऐंसी आदि की जांच कराई जानी चाहिए।

विटामिंस और दर्दनाशक दवाओं का उपयोग चिकित्सक की सलाह अनुसार नियमित रूप से करते रहना चाहिए।

कउंसिलिंग, योग और मेडिटेशन भी इस समस्या में बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं।

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