भास्कर ने 2020 के भारत को देखने की कोशिश की है। यह भारत आर्थिक रूप से विकसित भारत होना चाहिए। लेकिन इसके लिए अगले दस बजट भारत के होने चाहिए। भारत मजबूत होगा तो पूरी अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। भारत यानी वह भारत जो विकास में पीछे छूट गया है। जो देश के मेट्रो शहरों से आधी सदी दूर रहता है। उस भारत को केंद्र में रखकर अगर देश की सरकारें अगले दस बजट बनाती है तो अर्थव्यवस्था के सभी घटकों को मजबूती तो मिलेगी ही। इसके साथ ही यह विकास टिकाऊ और समावेशी भी होगा।
इस कदम की शुरुआत करने का पहला मौका केंद्र में गठित संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की नई सरकार को आगामी छह जुलाई को पेश किये जाने वाले अपने पहले बजट में मिलेगा। अभी तक जो संकेत मिल रहे हैं उसमें यह बात दिख रही है कि शायद इस सरकार का पहला बजट भारत पर ही केंद्रित होगा। यानी इसमें स्टॉक मार्केट, कॉरपोरेट जगत और सेवा क्षेत्र की बजाय आम आदमी के जीवन को बेहतरी की ओर ले जाने वाले प्रावधान अधिक होंगे। रोजगारोन्मुखी योजनाओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के कदमों का फायदा राजनीतिक रूप से यूपीए को मिल भी चुका है। पिछली यूपीए सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (एनआरईजीए) और करीब 60,000 करोड़ रुपये के कृषि कर्जो को माफ करने जैसे फैसले लिये थे। यूपीए को दोबारा सत्ता में लाने के लिए इन दो कदमों को काफी अहम माना जा रहा है।
अगर इस तरह के दो बड़े कदम राजनीतिक रूप से किसी गठबंधन को इतना बड़ा फायदा पहुंचा सकते हैं तो अगर सरकार वाकई अगले दस बजट और उसमें लिये गये फैसलों के क्रियान्वयन पर गंभीर हो जाती है तो यह राजनीतिक रूप से एक बहुत बड़े फायदे का सौदा हो सकता है।यहां बात अगले दस बजटों की जा रही है। साथ ही बात सिर्फ कृषि क्षेत्र और किसानों की नहीं है बल्कि छोटे शहरों, कस्बों और गांवों को जोड़कर जिस बहुसंख्यक बनने वाली देश की आबादी की है। बजट के समय सरकारी अधिकारियों, मंत्रियों और अर्थविदों से लेकर विभिन्न क्षेत्र के विशेषज्ञों तक सभी के बीच कर प्रावधानों, कर छूट, निर्यात सुविधाओं में बढ़ोतरी, विभिन्न क्षेत्रों के लिए छूट और आवंटन बढ़ाने जैसे अनुमानों और मांगों की बाढ़ रहती है। यानी सभी कुछ इंडिया को केंद्र में रखकर ही चलता रहता है। लेकिन कभी किसी बड़े फोरम पर यह दबाव नहीं बनाया जाता है कि जो लोग आर्थिक विकास की मुख्य धारा में पीछे छूट गये हैं, उनको केंद्र में रखकर बजटीय प्रावधान की जरूरत है। लेकिन यहां तो अर्थव्यवस्था के ग्लोबल संकट के चलते प्रभावित हो रहे उद्योगों के लिए पहला और दूसरा स्टिमुलस पैकेज और अब तीसरे की उम्मीद बजट में की जा रही है।
लेकिन कृषि और ग्रामीण व अर्धशहरी भारत में आजीविका के संसाधन बढ़ाने, आम आदमी के जीवन में सुधार के लिए किसी स्टिमुलस पैकेज की चर्चा तक नहीं हुई। अगर सरकार भारत को आगे बढ़ाने की बात करती है तो उसका फायदा भी उस उद्योग और सेवा क्षेत्र ही अधिक मिलेगा जो अभी तक के विकास का सबसे ज्यादा फायदा उठा रहा है। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में अगर बेहतर स्कूल, चिकित्सा और ढांचागत सुविधाएं होंगी,रोजगार के अधिक साधन होंगे तो वहां से मांग निकलेगी। बाजार का दायरा बढ़ेगा। बड़े शहरों में जब सरकारें चौबीसों घंटे बिजली और पानी मुहैया कराने की बात करती हैं तो यह आवाज कहीं से नहीं आती कि अभी तक अधिकांश गांव बिजली से ही वंचित है। गांव ही नहीं तो छोटे शहरों और जिला मुख्यालयों तक की हालत यह है कि वहां चार से 10 घंटे ही बिजली नसीब होती है। इसके चलते वहां की उत्पादकता किस तरह से कुंद हो रही है। इसकी चर्चा नहीं की जाती है। देश के बड़े शहरों और औद्योगिक इलाकों में आला दर्जे के ढांचागत विकास और परिवहन व रिहायशी सुविधाओं के विकास में देश के अधिकांश संसाधन खर्च किये जा रहे हैं। क्या दूर-दराज के गांव में रहने वाले देशवासियों को उस तरह के सुविधाजनक जीवन जीने का हक नहीं है।
आजादी के 62 साल में सरकारें इंडिया को केंद्र में रखकर बजट बनाती रही है। भारत के लिए वादे अधिक और काम कम किया जाता रहा है। ऐसे में सरकार के लिए अब यह मौका है कि वह अगले दस साल भारत को समर्पित कर एक मजबूत भारत और समावेशी व टिकाऊ विकास के रास्ते पर चले। यह कदम राजनीतिक ही नहीं सामाजिक रूप से भी देश को मजबूत करने के साथ टिकाऊ विकास की दिशा में ले जाने में मददगार साबित हो सकता है।