- संपादकीय
उत्तर प्रदेश के अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचे को ध्वस्त किए जाने के कारणों का पता लगाना कोई आसान काम नहीं था। इस घटना के कुछ समय बाद ही हाईकोर्ट के पूर्व जज एमएम लिब्राहन की अध्यक्षता में जिस जांच आयोग का गठन किया गया, उसे भी अपना काम पूरा करने में लगभग सत्रह साल लग गए। मंगलवार को आयोग द्वारा अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंपे जाने के साथ ही इस विषय पर विवादों का सिलसिला शुरू हो गया है।
पहला सवाल जो सभी ओर से उठ रहा है वह यह कि इतनी बड़ी घटना के कारणों और उसमें संलिप्त लोगों का पता लगाने में हुई इतनी देर के बाद ऐसी जांच का मतलब ही क्या है? गठन के बाद आयोग को मार्च 1993 में ही अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी पर कार्यकाल में 48 बार विस्तार मांगने के बाद यह तैयार हो पाई और उम्मीद है कि संसद के आने वाले सत्र में इसे सदन के पटल पर रखा जाएगा।
इस कांड में जिन लोगों के बयान लिए गए, उनमें से उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और मध्यप्रदेश की उमा भारती आज भाजपा में नहीं हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव आज जीवित नहीं हैं। कई अन्य नेताओं की राजनीतिक प्रतिबद्धताएं बदल चुकी हैं। इतने परिवर्तनों के बाद भी इस महत्वपूर्ण घटना की जांच रिपोर्ट पर चर्चा से विवाद बढ़ना अपरिहार्य है।
लोकसभा चुनाव के बाद रिपोर्ट के सौंपे जाने से इसका चुनावी लाभ उठाने की संभावनाएं तो फिलहाल नहीं हैं। लेकिन राजनीतिक लाभ उठाने में कांग्रेस, भाजपा व समाजवादी पार्टी जैसे दल संभवत: पीछे नहीं रहना चाहेंगे।
इस घटना में तत्कालीन नरसिंह राव सरकार की भूमिका और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी द्वारा कालांतर में घटना पर अफसोस जाहिर करने की चर्चा आज भी होती है। देखना है कि आज की प्रतिक्रियाएं उस वक्त घटी घटनाओं की वास्तविकता से कितनी दूर या पास हैं।
घटना के बाद ही मार्च 1993 में मुंबई के बम धमाके हुए और एक प्रकार से समाज में संशय और अविश्वास का माहौल पैदा हुआ। रिपोर्ट पर केंद्र सरकार को अगले छह महीनों के अंदर कार्रवाई रिपोर्ट (एटीआर) दाखिल करनी है।
जरूरी यह है कि किसी भी स्थिति में देश के सामाजिक और सांप्रदायिक वातावरण पर इस प्रकरण का कोई गंभीर असर न पड़े। जब जांच में 17 साल लग गए तो ध्वंस के दोषियों को सजा दिलाना वैसे भी लंबी प्रक्रिया है।