- जीवन दर्शन
एक बार गांधीजी को लंदन के दौरे पर जाना था। उन्होंने मीराबेन को इसकी तैयारी करने के लिए कहा। गांधीजी की दिनचर्या बिलकुल नियमित थी। उनके दिनचर्या की देख-रेख का जिम्मा मीराबेन का था। यही वजह है कि गांधीजी जब कभी बाहर जाते तो वे उनके साथ ही रहती थीं।
गांधीजी ने उन्हें भी लंदन साथ चलने को कहा। गांधीजी की एक आदत थी कि वे भोजन के साथ शहद का भी नियमपूर्वक सेवन किया करते थे।
मीराबेन गांधीजी के सामान के साथ शहद की शीशी रखना भूल गईं। लंदन पहुंचकर जब उन्हें इसका भान हुआ तो उन्होंने वहां शहद की नई शीशी खरीद ली। जब गांधीजी कार्य निपटाकर भोजन करने बैठे तो शहद की नई शीशी देखकर मीराबेन से बोले - उस पुरानी शीशी में काफी शहद था, फिर तुमने यह नई शीशी क्यों मंगवाई?
मीराबेन ने डरते हुए कहा - बापू, मैं शहद की पुरानी शीशी लाना भूल गई थी। यह सुनकर बापू बोले - यदि एक दिन मैं शहद नहीं खाता, तो क्या हो जाता? तुम्हें पता होना चाहिए कि हम लोग जनता के पैसे से जीवन चलाते हैं और जनता का एक-एक पैसा बहुमूल्य होता है। पैसे की फिजूलखर्ची कतई नहीं होनी चाहिए। मीराबेन ने गांधीजी से क्षमा मांगी और उनकी बात सदा के लिए गांठ बांध ली।
गांधीजी के जीवन से जुड़ा प्रसंग मितव्ययिता के महत्व को रेखांकित करता है। धन के सदुपयोग का ही दूसरा नाम मितव्ययिता है। जीवन में धन का मितव्ययी तरीके से इस्तेमाल करना बहुत जरूरी है।