- जीने की राह
जो बातें मन को विपन्न और कुंठित बनाती हैं, उन्हें अपने पास मत फटकने दो। कुंठित मन का मतलब है, कुंठित व्यक्तित्व। आत्म-नियंत्रण की शुरुआत विचार से होती है। जो विचार हमारा स्वभाव बन जाए, उसे धीरे-धीरे सारा शरीर आत्मसात कर लेता है।
अगर हमारे विचार संयत हैं। अगर हम मानसिक क्रिया को नियंत्रित कर सकें तो जीवन की समस्त परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम हो सकते हैं।
अगर हम देखें कि कोई व्यक्ति दलदल में फंसा हुआ है और बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रहा है, तो क्या हम उसकी सहायता के लिए नहीं दौड़ेंगे? हम उसे और आगे धकेलकर उसकी जान कतई खतरे में नहीं डालेंगे।
लेकिन जब कोई आदमी क्रोध में होता है, तो खुद शांत रहकर उसे शांत करने के बजाय हम भी आपे से बाहर हो जाते हैं और उसके क्रोध को बढ़ा देते हैं। जो लोग गुस्सैल स्वभाव के हैं, वे हमेशा उनके कृतज्ञ होते हैं, जो लोग उन्हें शांत करते हैं और ऐसे शब्द कहने से बचाते हैं, जिनके लिए बाद में अफसोस करना पड़े।
व्यक्ति किसी विकट स्थिति में घिर जाने पर अगर अपना मन शांत रखे तो उस स्थिति से उसके सुरक्षित निकलने की ज्यादा संभावना होती है। विकट स्थिति में ठंडे व शांत मन से सोचने के लिए जिस आत्मबल की दरकार होती है, वह उसी समय उत्पन्न नहीं होता, बल्कि दैनिक जीवन के सतत अभ्यास से आता है।
संकट के समय उचित व्यवहार का निर्णय छोटी-छोटी घटनाओं में संयत व्यवहार से होता है।
- स्वेट मार्डेन