- राग दरबारी
सखी, मैं यहां हूं इन दिनों, इस भीलांचल में। वे दौरे पर गए हैं। उमस के बाद बादल कुछ बरसे, फिर चले गए।
‘बरस गयो बैरी बदरवा।’ तुझे याद है न, हम गाती थीं पीहर में। अब वह लोकगीत याद नहीं आता। कॉलेज में पढ़े पंत और निराला के बादल-गीत भी भूल गई। मुझे एक ही पीड़ा सता रही है, ‘एक बंगला बने न्यारा’ इसी आदिवासी अंचल में। चैन से रहेंगे। रिटायर होने के बाद या ये कभी सस्पेंड हो गए, तो भी ठाठ से दिन गुजरेंगे। बस प्रजातंत्र फलता-फूलता रहे।
प्रजातंत्र में कौन दुखी है ऐरी सखी। दूध में पानी मिलाकर लाता है कालू और पूरे पैसे ले जाता है। फिर भी गरीब है। हम क्या करें? लोक-संस्कृति को तमाशा बनाकर पेश करने वाले ऐश कर रहे हैं और नट, गायक, नर्तक अभावों का रोना रो रहे हैं। यह भी बात हुई कोई!
यूं तो सब ठीक-ठाक है यहां। पर चिंता यह कि पद्मावती नदी के किनारे एक बंगला बन जाए। ठेकेदार ईंट-चूना जुटा देंगे। मजदूर मुफ्त में मिल जाएंगे। ये सबको सब्सिडी देते हैं, मगर ये बादल कम्बख्त बरसते नहीं जोर से। तगड़ी बारिश हो जाए, सब कुछ ध्वस्त हो जाए तो राहत कार्य चले।
तू तो मेरी अपनी है, इसीलिए लिख रही हूं। यहां खाओ और खाने दो, लूटो और लूटने दो जैसे मुहावरे चरितार्थ होते हैं। नए साल में दोहरा लाभ हुआ था। सूखा पड़ा तो हरियाली आ गई ड्राइंग रूम तक। कूलर, फ्रिज तो आ ही गए, कुछ बैंक बैलंेस भी बढ़ा। फिर आई बरसात।
भवानी भाई ने जो कही, उससे उलटी बात हुई। उन्होंने कहा है न, बरसात आ गई रे। बिजली महल पै गिर के दिल में समा गई रे। सौ कुटीरों के निर्माण का आदेश मंत्रीजी दे गए। हमें भी भरपूर मिला। बादलों ने गए साल कृपा की थी, लेकिन बंगला नहीं बना।
अब इस बार आंधी आई तो आम गिराकर चली गई। न कोई कुचला-दबा, न मरा, न भीलों के झोपड़े धराशायी हुए। कुछ तो हो। अफसरों की जिंदगी में प्राकृतिक विपदाएं ही खुशहाली लाती हैं। हरियाली देखकर नहीं, ऊपर की भयंकर मेघाओं को देखकर मन प्रसन्न होता है। कब प्रलय हो और कब हमारे बंगले के सृजन की कल्पना साकार हो।
सखी, न मैं ढीठ हुई, न कविता उफन रही है भीतर से। मैं तो प्रैक्टिकल हूं और वही लिख रही हूं जिसे जानकर भी बुद्धिजीवी, पत्रकार सामान्यजन कोई नहीं जानता।
ऊपरी आय यूं ही नहीं हो जाती। पहले तो कम्बख्त बादल बरसे जोर से, फिर अकाल-अभाव का तांडव हो। मंत्री, विधायक, अफसर दौरे पर आएं। इन्हें तो टापरे-टापरे जाकर बेचारे भोले-भाले भीलों को घर-घर से लाना पड़ता है, दुख की गाथा सुनाने। वे लोग सोचते हैं, फिर पसीजते हैं। जरूरत हुई तो नीचे की विनाशलीला को ऊपर से हेलीकॉप्टर या हवाई जहाज की सहायता से देखते हैं, फिर वित्तीय सहायता की घोषणा करते हैं।
हमारा कितना खर्च होता है ज्यादा बारिश में, मालूम है? वेतन तो कहीं लगता ही नहीं। पीने को विदेशी, खाने को कड़कनाथ.. क्या-क्या इंतजाम नहीं करने पड़ते। बाढ़ कुछ सुकून देती है। बिजली कड़कती है तो मानो रविशंकर का सितार बज उठता है मन में। झोपड़ियां धंसती हैं तो कल्पना बिलखती है। अब तो इक बंगला बन ही जाएगा न्यारा।
तुझे इतना लिख दिया कि इनकी इंक्वायरी हो जाए। कहूं किससे मन का दर्द? बादल हैं कि आ रहे हैं और बूंदाबांदी करके जा रहे हैं। जोर से बरसो कम्बख्त। प्रजातंत्र में हम भी दुखी हैं।