- संपादकीय
बंगाल में नगर निगम चुनाव में सत्ताधारी वामपंथी गठबंधन का सूपड़ा साफ हो गया है और कांग्रेस-तृणमूल गठजोड़ विजयी बनकर उभरा है। आम चुनाव में भी कुल मिलाकर यही स्थिति थी। तीन दशक से शासन कर रही कम्युनिस्ट पार्टियों की ऐसी दुर्दशा कभी नहीं हुई। यही लक्षण रहे तो आगामी विधानसभा चुनावों में वामपंथी सत्ता से बाहर हो जाएंगे।
राजनीति के पंडित मान रहे हैं कि बंगाल में जहां मार्क्स और लेनिन दीवारों पर सजते थे, अब सड़क पर आ गए हैं, बत्तीस साल बाद बंगाल वामपंथ से ऊब गया है। इस पर गौर करने की जरूरत है, क्योंकि बंगाल वामपंथ से नहीं ऊबा हो सकता, वामपंथी वामपंथ से हट गए हैं।
लड़ाई वही है, जो सत्तर के दशक में थी। पूंजीवादी पार्टियां और उनके सत्तालोलुप कारिंदे एक तरफ और जनांदोलन दूसरी तरफ। उस समय मुद्दे भी वही थे। सरकार का आम जनता से सरोकार कम होना, सत्ता के नजदीकी लोगों का विकास के मालपुए भकोस जाना और कल्याणकारी योजनाओं का एक धेला भी असली हकदारों तक नहीं पहुंचना।
फर्क इतना है कि तब वामपंथी सरकार में नहीं थे, जनांदोलन का हिस्सा थे, भूमि वितरण की लड़ाई लड़ रहे थे, सामंतवाद के खिलाफ डंका पीट रहे थे, हंसिया-हथौड़ा हाथ में लिए लाल रंग से गांव-गांव पोत रहे थे।
ममता बनर्जी भले मार्क्स और लेनिन को उद्धृत नहीं करतीं, पर विचारधारा उनकी धुर वामपंथी है। दूसरी ओर वामपंथ के नाम पर राजपाट संभाले कम्युनिस्ट दलों के लोग सामंतवाद का चलता-फिरता नमूना बन गए हैं। पुलिस वाम कैडर की पिछलग्गू बनी रहती है।
आज औद्योगिकीकरण और अत्याचार के खिलाफ ममता आवाज उठाती हैं और माओवादियों की मानें तो उन्हें ममता का साथ मिला है। एक माओवादी कमांडर ने यह खुलासा भी कर दिया कि लोकसभा चुनाव में उन्होंने ममता की मदद की थी।
सच यह है कि बंगाल ने वामपंथ से मुंह नहीं मोड़ा, वह अब भी वामपंथ के साथ खड़ा है। चूंकि वामपंथ की विचारधारा के साथ ममता बनर्जी खड़ी हैं, इसलिए जनता अब उनकी तरफ हो गई है। बंगाल के वामपंथी नाम के हैंे, काम के नहीं। कम्युनिस्ट कारिंदों का काम तो राज करना है।
उनका नियंत्रण सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अनाज से लेकर केबल टीवी तक पर है। आम आदमी को हर छोटे-बड़े काम के लिए पार्टी के लोकल मेंबर से हामी लेनी होती है। हर नियंत्रणवादी ताकत के साथ यही होता है, जब नियंत्रित अनियंत्रित हो जाते हैं, तब तख्ता पलट जाता है और ताज उलट जाता है।