- जीने की राह
अथर्ववेद में कहा गया है कि मानव दरअसल मानव की श्रेणी में तब ही आता है, जब वह उच्च संस्कारों, विचारों और व्यवहार का अनुगामी हो। इसमें मनुष्यों से आह्वान किया गया है कि मनुर्भव अर्थात मनुष्य बनो। पहले मनुष्य बनोगे तो विवेक का सकारात्मक प्रयोग करने की क्षमता विकसित होगी।
विवेकशील मनुष्य ही उन्नत राष्ट्र का प्रतिरूप होता है। अथर्ववेद मानव से कहता है कि वह राष्ट्र को बनाए और उसे व्यवस्थित करे। इसमें यह संकल्प भी दोहराया गया है कि तुम्हें यह राष्ट्र मिला है तो इसे अपनी तेजस्विता से उन्नत कर।
यह स्पष्ट है कि राष्ट्र का गौरव, गरिमा और वैचारिक वैभव इसके निवासियों के आचार-विचार का दर्पण होता है। लोगों की जीवनशैली और जीवन दृष्टि राष्ट्र का परिचय देती है और उसकी अस्मिता को प्रकट करती है। इसीलिए यह कहा जाता है कि हम उत्तम मार्ग पर चलते हुए राष्ट्र की उन्नति करें। इसके साथ-साथ यह संकल्प भी दोहराने के लिए कहा जाता है कि इस सच्चरित्र राष्ट्र में हम अपना योगदान दें।
इसी तरह यजुर्वेद में कहा गया है - इयं ते राष्ट्र। अर्थात यह आपका राष्ट्र है। यह कथन एक दायित्वबोध का व्रत है। राष्ट्र का स्वामी, सेवक, राजा या प्रजा वह प्रत्येक व्यक्ति है जो उसकी सांस्कृतिक भाव से अनुप्रेरित धरा पर रहता है। जब राष्ट्र व्यक्ति-व्यक्ति का है तो उससे संबंधित सुख-दुख भी सबके हैं। हमें समन्वित और सौहाद्र्रपूर्ण भाव से राष्ट्र सेवा में लग जाना चाहिए क्योंकि यह हमारा है।
- स्वामी चक्रपाणि