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हवाई सफर में कहीं हवाइयां न उड़ जाएं!
आलोक पुराणिक Friday, July 03, 2009 10:10 [IST]  

- राग दरबारी

एयर इंडिया से खबरें हैं कि सेलरी देने की रकम का भी टोटा है। हवाई जहाज हवाखोरी करते हैं, पर पायलट तो हवा खाकर जिंदा नहीं रह सकते। बड़े बड़े हवाबाज जमीन पर उतर रहे हैं। इधर तो डर सा लगने लगा है, हवाई जहाज में उड़ने में।

क्या पता पायलट ऊपर ले जाकर कह दे कि अब न चलाऊंगा आगे। अब हमने हड़ताल शुरू कर दी है। पिछले महीने की सेलरी नहीं मिली है। सवारियां रो-गाकर वहीं रकम इकठ्ठी करें और कहें - भई तू पकड़ अपनी सेलरी, हमें नीचे तो पहुंचा।

अभी एक फ्लाइट पकड़ने गया तो पता चला कि जिस रूट का टिकट था, उस रूट पर कम पैसेंजरों के चलते फ्लाइट कैंसल कर दी गई। एयरलाइंस वाले बोले कि अब जहाज वहां नहीं, दूसरे शहर जा रहा है। वहां की सवारियां ज्यादा हैं। आप चाहें तो उस शहर में चले जाएं। अब हवाई जहाज बसों के हिसाब से चल रहे हैं। जहां की सवारियां मिलेंगी, वहीं उड़ लेंगे।

आज सारी फ्लाइट चेन्नई की तरफ ही जा रही हैं। कल सारी फ्लाइट कोडाईकनाल ही जा रही हैं। उड़ने वाले को उड़ने से पहले पता ही न होगा कि कहां को जा रहे हैं। सस्पेंस, थ्रिलर एक्सपीरियंस और किसे कहते हैं जी।

इंक्वायरी करने पर पता चला कि अधिकांश एयरलाइंस घाटे में चल रही हैं और मुनाफे में लाने के लिए प्राइवेट बस वालों से कंसल्टेंसी ली जा रही है। प्राइवेट बस वाले नई-नई तरकीबें सुझा रहे हैं। मुझे लगता है कि अगली बार हवाई जहाज के ऊपर भी सौ, डेढ़-सौ सवारियां चढ़ी मिलेंगी।

हाल में एक एयरलाइंस की उड़ान के दौरान देखा कि एयर होस्टेसों ने स्माइल करना बंद कर दिया है। पूछने पर बताया कि अब मुफ्त में कुछ नहीं मिलता। पानी, चाय, नाश्ता सब खरीदना पड़ता है। स्माइल चाहिए तो इसकी फीस एक हजार रुपए निकालो। मुफ्त में कुछ नहीं मिल रहा है। फिर जिन्हें सेलरी नहीं मिल रही है, उन्हें स्माइल करना पड़ जाए, यह तो आसमान वालों के लिए विकट आफत है। सिर्फ जमीन का बंदा ही इंडिया में सेलरी के बगैर मुस्करा सकता है।

उधर सॉफ्टवेयर वाले बहुत पहले ही सॉफ्ट हो चुके हैं। हार्ड तो इन दिनों पहलवान ही हैं, जो तमाम तरह के कर्ज वसूलने में लगे हैं। मैट्रिमोनियल विज्ञापनों में कन्याओं के मां-बाप साफ तौर पर लिखवा रहे हैं - सॉफ्टवेयर वाले नीड नॉट एप्लाई। कन्याएं जिन धंधों के लड़कों के सपने देखती थीं, अब उनके सपने तक डरावने दिख रहे हैं। हाय, कैसे-कैसे धंधे ऐसे-ऐसे हो गए। सॉफ्टवेयर वाले बता रहे हैं कि पहलवानों की डिमांड उनके मुकाबले ज्यादा है।

सॉफ्टवेयर वाले बेरोजगार हैं। उनके क्रेडिट कार्ड पर बकाया रकम उगाहने के लिए पहलवानों को रोजगार मिल रहा है। मंदी में पहलवानों की तेजी बरकरार है। ‘ऋणम् कृत्वा घृतम् पिवेत’ जिसने लिखा था, वह जरूर पहलवानों के रोजगार का हितैषी रहा होगा।

टीवी चैनल वाले अलग परेशान हैं। भूतों के रेट जर्नलिस्टों से ज्यादा हो लिए हैं। भूतगीरी बतौर कॅरियर बेहतर विकल्प है, पर अभी तक किसी विश्वविद्यालय ने इससे जुड़ा कोर्स पेश नहीं किया है। भारतीय शिक्षा व्यवस्था समय के साथ नहीं बदल रही है, जिसने भी यह बात कही है, सही कही है।

अब चलूं, बच्चों को पहलवानी के फायदे बताऊं। सॉफ्टवेयरी करके सॉफ्ट बनना बेकार है। आइए, हार्ड पहलवान बनें।

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