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वर्षो का संचित गुस्सा
महाश्वेता देवी Friday, July 03, 2009 10:19 [IST]  

पश्चिमी मेदिनीपुर जिले के लालगढ़ में अर्धसैनिक बलों को भेजना गलत था। लालगढ़ आंदोलन के मूल में पुलिस अत्याचार के अलावा अंचल की दरिद्रता, गरीबी और वंचना रही है। समस्या के समाधान के लिए विकास को लक्ष्य बनाना चाहिए था।

devi विडंबना देखिए कि लक्ष्य बनाया गया, माओवादियों को। विडंबना यह भी है कि इस लक्ष्य की आड़ में सुरक्षाबल दमन का सहारा ले रहे हैं। बंगाल और केंद्र की सशस्त्र पुलिस वाहिनी ने पिछले महीने के दूसरे पखवाड़े में लालगढ़ में पुलिस की उसी ज्यादती की पुनरावृत्ति की, जिसके विरोध में लालगढ़ आंदोलन आठ महीने पहले आरंभ हुआ था।

नवंबर 2008 में लालगढ़-झारग्राम-शालबनी की पांच हजार एकड़ क्षेत्र की जमीन पर प्रस्तावित विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के शिलान्यास के लिए तत्कालीन इस्पात मंत्री और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री जब वहां गए थे, तो उनके काफिले के निकट माओवादियों ने हमला किया था। उसके ठीक बाद लालगढ़ के पूरे अंचल में माओवादियों की तलाशी का अभियान आरंभ हुआ। तलाशी के नाम पर रात में बंगाल पुलिस ने आदिवासी महिलाओं पर कहर बरपाया।

महिलाओं पर हुए अत्याचार के विरोध में ही लालगढ़ के आदिवासियों ने आंदोलन छेड़ा था। पुलिस अत्याचार से बचने के लिए इलाके में पुलिस का प्रवेश रोकने के उपाय लालगढ़ के आंदोलनकारियों ने किए। उन्होंने लालगढ़ एवं आस-पास के सारे रास्ते काट डाले। सड़कों पर पेड़ों के अवरोधक खड़े कर दिए। इस आंदोलन को चलाने के लिए एक कमेटी बनाई गई।

lalgarh उसका नाम रखा गया- पुलिस अत्याचार विरोधी जनसाधारण की कमेटी। कमेटी ने मांग की कि आदिवासी महिलाओं के साथ हुई ज्यादती के लिए पुलिस माफी मांगे और रात में महिलाओं की तलाशी नहीं ली जाए। माओवादी होने के संदेह में गिरफ्तार निर्दोष लोगों को छोड़ा जाए और अंचल में न्यूनतम नागरिक सुविधाओं का प्रबंध किया जाए।

प्रशासन ने यह मांग नहीं मानी तो स्वाभिमानी आदिवासी तीर-कमान-टांगी जैसे अपने पारंपरिक हथियार लेकर गांवों की सीमा पर पहरेदारी करने लगे, ताकि क्षेत्र में पुलिस प्रवेश न कर सके। इस आंदोलन को पड़ोसी जिलों के आदिवासियों का समर्थन भी मिल गया। इस तरह पश्चिमी मेदिनीपुर के लालगढ़ का आंदोलन बांकुड़ा और पुरुलिया के आदिवासी-बहुल इलाकों में भी फैल गया। आदिवासियों के इस विद्रोह का माओवादियों ने समर्थन किया। आंदोलन के कारण इन तीन जिलों के 18 पुलिस क्षेत्रों में पुलिस निष्क्रिय सी हो गई।

लेकिन तीनों जिलों में आंदोलन के फैलने की वजह सिर्फ पुलिस संत्रास नहीं था। उसकी सबसे बड़ी वजह वंचना और पिछड़ापन था और सरकारी वंचना के खिलाफ लोगों का वह संचित गुस्सा था जो आंदोलन के रूप में प्रकट हुआ।

पश्चिम बंगाल के तीनों जिलों के आदिवासी न्यूनतम नागरिक सुविधाओं से वंचित रहे हैं। पश्चिमी मेदिनीपुर के लोधा शबर और पुरुलिया के खेड़िया शबर आदिवासियों को बत्तीस वर्र्षो के वाम शासन में न पेयजल सुविधा मिली, न सड़क, न अस्पताल। ये सुविधाएं मांगने पर उन्हें पुलिस की लाठी मिलती है।

सरकार आज भी शबर आदिवासियों को जन्मजात अपराधी मानती है। कहीं भी अपराध हो, पकड़े आदिवासी जाते हैं। वाममोर्चा के आरंभिक शासनकाल में 37 लोधा शबर मार डाले गए थे। वाम राज में चुनी कोटाल नामक लोधा लड़की को इसलिए उच्च शिक्षा से वंचित रखा गया क्योंकि वह निचली जाति से आती थी। अंतत: उसे आत्महत्या के लिए विवश किया गया।

वाममोर्चा ने आदिवासियों का जीवन नरक कर दिया। जंगल पर से उनके स्वाभाविक अधिकार छीन लिए गए। जिस जंगल से आदिवासी फल, मधु, लकड़ी, पत्ते आदि का संग्रह कर जीवन-यापन करते थे, वहां उनका जाना निषिद्ध कर दिया गया। सदियों की आजमाई जीवन शैली विच्छिन्न होने लगी। जीविका का कोई दूसरा उपाय भी नहीं हुआ। ऐसे में भूख से दम तोड़ने के अलावा उनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा। लालगढ़ के पास आमलाशोल में पांच शबर आदिवासी 2004 में भूख से ही मरे थे।

इसके बावजूद बंगाल के आदिवासियों को बीपीएल कार्ड नहीं मिलता। उन्हें सौ दिन की रोजगार गारंटी योजना का लाभ नहीं मिलता। ये सारी योजनाएं स्थानीय माकपा नेता की देख-रेख में क्रियान्वित होती हैं। केंद्रीय रोजगार आवास योजनाओं के पैसे से माकपा के लोग अपने आलीशान मकान बनाते हैं, माकपा के दफ्तर बनाते हैं। लालगढ़ में पंद्रह सौ रुपए मासिक पाने वाले एक वाम नेता ने चालीस लाख रुपए कीमत वाली हवेली खड़ी कर ली।

आदिवासियों को मिट्टी का घर भी मयस्सर नहीं और माकपा नेता की आलीशान कोठी, इसीलिए लोगों ने अपना गुस्सा उस हवेली पर उतारा। मैं मानती हूं कि पश्चिमी मेदिनीपुर-बांकुड़ा-पुरुलिया के 105 वर्ग किलोमीटर के जंगल क्षेत्र में रहने वाले संथाल, लोधा, खेड़िया, लोधा शबर, मुंडा, मुमरू, महतो बेहद गुस्से में हैं। मैं यह भी मानती हूं कि उनका गुस्सा जायज है। विकास के नाम पर आजादी के 62 वर्र्षो बाद भी कुछ भी हासिल नहीं होने के कारण वे गुस्से में हैं। मैं पूछती हूं कि कांटापाहाड़ी-बांसपाहाड़ी में आज तक बिजली क्यों नहीं पहुंची?

चार दशकों से आदिवासियों के बीच काम करते जाने के कारण आदिवासियों से जुड़ी कोई खबर मुझे तुरंत मिल जाती है। लालगढ़ में पुलिस ऑपरेशन के दौरान सुरक्षाबलों ने जो अत्याचार किए हैं, उनके खिलाफ जनांदोलन को तेज करने की जरूरत है। मुझे लगता है कि जितने भी तरह के आतंक हैं, उनमें सबसे बड़ा आतंक राजकीय आतंक होता है। लालगढ़ के निवासियों को आतंकित करने के लिए ऊपर हेलीकॉप्टर घुमाया जा रहा है।

बेलपाहाड़ी, चाकाडोबा, पिड़ाकाटा में वाम कैडर क्या अपने आतंकराज के बूते स्थापित होना चाहते हैं? लालगढ़ से कुछ दूर केशपुर और गड़बेता में माकपा कैडरों ने आतंक राज कायम कर रखा है। वहां अर्धसैनिक बल माकपा के आतंक से उन इलाकों को क्यों मुक्त नहीं करा रहे हैं? विडंबना यह है कि आयला तूफान पीड़ितों के उद्धार के लिए इन हेलीकॉप्टरों की सेवाएं नहीं ली गईं। आयला में उजड़े सुंदरवन के इलाकों में हेलीकॉप्टर से राहत सामग्री क्यों नहीं गिराई गई?

लालगढ़-झारग्राम-शालबनी में पुलिस ऑपरेशन चलाकर क्या सरकार इलाके को सेज के लिए खाली कराना चाहती है? क्या यही वामपंथ है? पुलिस ऑपरेशन की आड़ में लालगढ़-शालबनी में आदिवासियों का उच्छेद कर वहां सेज बनाना वामपंथ को कलंकित करने के बराबर है।

लालगढ़ में पुलिस अत्याचार देखकर आए अपर्णा सेन, सांवली मित्र, जय गोस्वामी जैसे कलाकर्मियों पर निषेधाज्ञा तोड़ने का आरोप लगाते हुए मुकदमा कायम करना आंदोलन को दबाने की कोशिश का हिस्सा है। यह आदिवासियों का समर्थन करने पर बुद्धिजीवियों को भयाक्रांत करना है। आदिवासियों की एकता से डरी सरकार उनकी एकता तोड़ने में लगी है।

- लेखिका प्रसिद्ध बांग्ला साहित्यकार हैं।

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