National
तो क्या रेलवे निजीकरण की दिशा में मुड़ चुकी है..!
RAJESH YADAV Friday, July 03, 2009 18:20 [IST]  

विश्लेषण: घोषणाओं के पीछे क्या है। क्या ममता के इस रेल बजट का इस बात का श्रेय देना होगा कि इसने चाहे-अनचाहे ही शायद रेलवे का निजीकरण की शुरुआत कर दी है। शायद हां। हालांकि ऐसा कहना कई लोगों को जल्दीबाजी लग सकता ह,ै लेकिन इस बजट की कई घोषणाओं की तरफ ध्यान दें तो बात दूर की कौड़ी नहीं लगेगी। आइए नजर डालते हैं उन कदमों पर जो साबित करती हैं कि यह बात केवल हवा-हवाई नहीं है..

कदम एक : पीपीपी के आधार पर विकसित होंगे 50 बड़े रेलवे स्टेशन

पहले कहा जा रहा था कि रेलमंत्री अपने बजट भाषण में निजीकरण को कोई खास तवज्जो नही देंगी। लेकिन 50 रेलवे स्टेशनों को निजी क्षेत्र की मदद से विश्व स्तर के बनाने की बात कही गई है। कुछ समय पूर्व ही सरकार ने प्रस्तावित आर्थिक सुधार एजेंडे के तहत ट्रेनों के संचालन के क्षेत्र में सरकारी एकाधिकार के क्षेत्र को खत्म करने का प्रस्ताव दिया है। ममता के रेल बजट की भाषा भी उसी अनुरूप दिखलाई पड़ती है।

कदम दो : भागीदारी से खुलेंगे मेडिकल कॉलेज

ममता बनर्जी ने अपने बजट भाषण में जो एक और घोषणा की है, उसके तहत रेलवे अपनी खाली पड़ी जमीन पर निजी क्षेत्र की भागीदारी से मेडिकल कॉलेज और सात नए नसिर्ंग कॉलेज खोलने का एलान किया है। बात जनता के स्वास्थ्य की है और इसकी चिंता के बहाने रेलमंत्री ने रेलवे की आमदनी और उसके निजीकरण के मार्ग को खोलने का प्रयास किया है।

कदम तीन: निवेश का 40 फीसदी निजी क्षेत्र से

अब जरा लाभ की पटरी पर दौड़ रही रेलवे की कमाई और सरकारी नीति की बात भी कर लें। दरअसल यूपीए सरकार का रेल मंत्रालय अपनी कमाई को बढ़ाने के लिए जिस नीति पर चल रहा है वह निजी क्षेत्र से होकर भी जाता है। सरकार ने अपने पिछले बजट में नीतिगत आधार पर तय किया था कि कुल निवेश का लगभग 40 फीसदी हिस्सा सरकारी निजी भागीदारी (पीपीपी) के जरिए लाया जाएगा। इसके लिए जो रास्ता चुना गया था उसके तहत रेलवे स्टेशनों को विश्वस्तरीय करना, मल्टी मॉडल लॉजिस्टिक पार्कों के निमार्ण के साथ बजट होटल की बात थी।

क्या समय की मांग है रेलवे का निजीकरण

सरकार की भाषा बजट में भले आम आदमी के हितों वाली लगती हो लेकिन उसका इरादा रेलवे के निजीकरण वाला है और यह कदम कुछ वैसा ही है जैसा कि 1991-92 में आर्थिक सुधारों के लिए शुरू किया गया था। आम आदमी का रेलवे से जिस तरह का जुड़ाव है उसे देखते हुए सरकार आलोचना से बचने के लिए सीधे हाथ कान पकड़ने के बजाय दूसरा रास्ता अपनाकर उदारीकरण की बयार को इस दिशा में मोड़ रही है।

अंतत:..

जिस तरह रेलवे की कमाई हो रही है उस स्थिति में आम आदमी के लिए कोई विशेष लाभ की योजना तो अभी तक रेल विभाग नहीं दे सका है। आम आदमी शुल्क चुकाने के साथ सुविधा भी चाहता है यह बात अब किसी से छुपी नहीं है। अब सुविधा चाहे सरकार दे या प्राइवेट क्षेत्र, यात्री तो बेहतर रेल सेवा और सुविधा की उम्मीद करता है।



संबंधित खबरें
* रेल बजट में मप्र के लिए क्या...
* विश्लेषणः रेल बजट से शेयर बाजार में उत्साह नहीं
* दीदी की रेल में आम का
* विश्व का पांचवां सबसे बड़ा रेल नेटवर्क
* मार्च 2010 में पूरा होगा रेल लाइन का विद्युतीकरण

Bookmark and Share


अपने विचार यहां लिखें:
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: