नई दिल्ली. केंद्र सरकार अब रैगिंग को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगी। रैगिंग जैसी अमानवीय घटनाओं में शामिल होने वालों को कड़ी सजा दी जाएगी। यह जानकारी केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने शुक्रवार को राज्यसभा में दी। उन्होंने कहा कि अधिकतर राज्यों में इस संबंध में कानून हैं इसलिए केंद्रीय कानून बनाने की जरूरत नहीं है।
कानूनी कार्रवाई : सिब्बल ने बताया कि रैगिंग की घटनाओं की रिपोर्ट के लिए एक हेल्पलाइन सेवा शुरू की गई है, इससे दोषी लोगों पर शीघ्र कार्रवाई में मदद मिलेगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने रैगिंग रोकने के लिए नियम बनाए हैं जो एक तरह से कानून ही हैं। जो भी इनका उल्लंघन करेगा, उस पर कानूनी कार्रवाई की जा सकेगी। रैगिंग की घटनाओं वाले संस्थानों पर भी कार्रवाई का प्रावधान है। ऐसे संस्थानों की मान्यता रद्द की जा सकती है तथा इनके अनुदान और आर्थिक मदद को रोका जा सकता है।
तत्काल प्रभाव से अमल : उन्होंने बताया कि यूजीसी के अंतर्गत आने वाले सभी शिक्षण संस्थानों को इन नियमों का पालन करना होगा। यूजीसी के दायरे से बाहर के संस्थानों पर भी ये नियम बाध्यकारी होंगे। मानव संसाधन मंत्रालय ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया, र्न्िसग काउंसिल ऑफ इंडिया और आल इंडिया काउंसिल ऑफ टेक्नीकल एजुकेशन को इन नियमों को तत्काल प्रभाव से अमल में लाने को कहा है।
केंद्रीय कानून बनाने से इनकार : रैगिंग रोकने के लिए केंद्रीय कानून बनाने से इनकार करते हुए सिब्बल ने कहा कि ज्यादातर राज्यों में कानून हैं, लेकिन इन पर अमल नहीं हो पा रहा। इस कमी की भरपाई करने की जरूरत है। अब यूजीसी के नियमों से यह हो सकेगा। कॉलेज में दाखिला लेने के समय विद्यार्थियों, यहां तक कि उनके अभिभावकों को शपथ पत्र देना होगा कि वे रैगिंग में शामिल नहीं होंगे। इसमें शामिल होने की स्थिति में उन पर परीक्षा में शामिल होने से रोक लगाने, निलंबन के अलावा कानूनी कार्रवाई की जा सकेगी। जल्द ही एक वेब पार्टल लांच कर इसमें ऐसे शपथ पत्र और हर विद्यार्थी की जानकारी रखी जाएगी। स्कूलों में भी बढ़ रही रैगिंग का जिक्र करते हुए सिब्बल ने कहा कि यूजीसी जैसे नियम स्कूल व्यवस्था में भी बनने चाहिए।