बजट भाषण चाहे रेल मंत्री का हो या वित्त मंत्री का। होता है यह कमाई और खर्चे के बारे में ही। लेकिन रेल मंत्री ममता बनर्जी के पूरे बजट भाषण में कमाई और खर्च की तो बात ही नहीं है। उन्होंने तो स्पीकर महोदया से यह तक अनुमति ले ली कि वे पूरा बजट भाषण भी नहीं पढ़ेंगी।
ममता जी को कमाई की चिंता शायद इसलिए नहीं है कि वे बंगाल के भद्रलोक की तरह पैसे के झंझट में नहीं पड़ना चाहतीं। रुपए-पैसे की चिंता कारोबारी, खजांची और मध्यवित्त लोग करते हैं। चूंकि उनकी पूरी पार्टी बुद्धिजीवियों और कलाकारों से भरी है, लिहाजा वे क्यों भौतिकतावादियों की तरह रुपए-पैसे की बातें करें। लेकिन यह याद रखा जाना चाहिए कि बगैर रुपए-पैसे की चिंता के आप रोजगार देने वाली देश की सबसे बड़ी एजेंसी की कि स्मत तय नहीं कर सकतीं। यह कहना तो अच्छा लगता है कि नीतियां तय करते समय वित्तीय फायदे पर नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व को पूरा करने पर जोर देना चाहिए। लेकिन अगर वह वित्तीय फायदे की परवाह नहीं करती हैं (जैसा कि बजट से जाहिर हो रहा है) तो वे रेल मंत्रालय के 14 लाख कर्मचारियों और उनके परिवारवालों का भविष्य खतरे में डाल रही हैं। ममता पांच साल के लिए मंत्री रहेंगी, लेकिन इन लोगों का पूरा आर्थिक भविष्य चौपट हो जाएगा।
रेल बजट को देखें तो ऐसा लगता है कि ममता हर किसी को खुश करने में जुटी थीं। वे हर एमपी को खुश करती नजर आती हैं। हर यात्री को दान देती दिखती हैं। ऐसा लग रहा है कि वे रेल मंत्री न होकर सामाजिक कल्याण मंत्री बन गई हैं। ममता की भाव-भंगिमाओं से यह लग रहा है कि रेलवे को भी तुरंत सामाजिक कल्याण मंत्रालय की रीति-नीति में ढाल देना चाहिए।
आपको यह जानकर दुख होगा कि रेलवे की आय पांच फीसदी गिर गई है। फुटकर आमदनी तो 54 फीसदी गिर गई। यहां तक कि मंदी से बेअसर रहने वाली यात्री आमदनी भी गिर गई। इन सबका असर कैश सरप्लस पर पड़ पर रहा है। वर्ष 2008-09 में सरप्लस का अनुमान 11,786 करोड़ रुपए था। लेकिन असल में यह गिर कर 6,355 करोड़ हो गया। यानी अनुमान में 46 फीसदी की कमी दर्ज की गई। यह कमी तो पिछले साल ही आ गई थी, जिसे लालू ने छिपा लिया था। इसलिए फरवरी के अंतरिम बजट में उन्होंने 5,572 करोड़ का लक्ष्य रखा था जो पिछल साल के टारगेट से 50 फीसदी कम है। मगर ममता ने इसे और 52 फीसदी कम करके 2,642 करोड़ पर ला दिया। इस तरह सरप्लस 11,786 करोड़ से 2,642 करोड़ पर आ गया।
अगर इतनी बड़ी गिरावट किसी निजी कंपनी में आती तो शेयरधारक सीईओ को निकाल बाहर करते। बोर्ड मीटिंग में पचासों सवाल पूछे जाते। आय तो पांच फीसदी गिरी लेकिन मुनाफा 77 फीसदी गिर गया। यानी आपके खर्च आपकी आय के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं। यह बेहद चिंता की बात है। फौरी तौर पर आप सामाजिक उत्तरदायित्व के नाम पर पचासों गाड़ियां शुरू कर दें। सौ स्टेशनों को विश्वस्तरीय बनाने के लिए पैसा लगा दें। रियायती टिकट देकर पत्रकारों को भी खुश कर दें। लेकिन आखिरकार ऐसा करके आप रोजगार देने वाली सबसे बड़ी एजेंसी को अंधेरे में धकेल रहे हैं। क्योंकि आपको न तो आय की चिंता है और न खर्चे की।
ममता बनर्जी रेलवे की दशा पर एक श्वेत-पत्र लाना चाहती हैं। श्वेत-पत्र में अकाउंटिंग की बाजीगरी के जरिए रेल को फायदे में लाने की लालू की करामात के बारे में लोगों को बताना चाहती हैं। यह भी पता चलेगा कि किस तरह उन्होंने आईआईएम और हार्वर्ड को अनुदान देकर रेलवे की तारीफ में कसीदे पढ़वाए। लेकिन अब ममता जिस अंदाज में रेलवे को खैरात में लुटा रही हैं, उससे तो दो ही साल में एक और श्वेत-पत्र लाने की स्थिति बन जाएगी। याद रखा जाना चाहिए कि अपने चौदह लाख कर्मचारियों की पेंशन और दूसरी वित्तीय जरूरतों को रेलवे को अपनी आमदनी से ही पूरा करना होता है। लेकिन जिस तरह एक सरकारी संस्थान को औने-पौने लुटाया जा रहा है, उससे इसका भविष्य अंधेरे में जाता दिख रहा है।
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