Vichaar
द्वंद्व के बीच कैसे हो बौद्धिक विकास
पं. श्रीराम शर्मा ‘ Saturday, July 04, 2009 11:19 [IST]  

द्वंद्व से परे जाकर व्यक्ति अपनी अभिरुचि को लक्ष्य के अनुरूप सही बिंदु तक ले जाने में सक्षम हो जाता है। ऐसे में बौद्धिक बिखराव से बचा जा सकता है तथा विषय पर केंद्रित होने में सहायता मिलती है। इंसान की बुद्धि की विशेषता है - तर्क करना।

तर्क यदि तथ्यपरक न हो तो व्यक्ति का दिमाग अपने ही बनाए मकड़जाल में उलझ जाता है। यह स्थिति बड़ी विषम और ऊहापोह भरी होती है। ऐसे में ही वैचारिक द्वंद्व पनपता है। द्वंद्वमय मन शंकाशील एवं संदेहमन हो जाता है एवं जीवन तनावपूर्ण बन जाता है।

मन को सकारात्मक सोच पर चलना और बुद्धि को सही चीजों का चुनाव करना आना चाहिए। जीवन में परिस्थितियां और प्रारब्ध सदैव द्वंद्व पैदा करते हैं। द्वंद्व जीवन में न आए, ऐसा संभव नहीं है, परंतु हमें इससे उबरना आना चाहिए। इसमें फंसकर औरों को कोसने की अपेक्षा कुशलतापूर्वक इससे निकल जाना ही श्रेयस्कर है।

यह मजबूत मानसिकता का परिचायक है, जिसका बौद्धिक संपदा के रूप में बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।

जब व्यक्ति द्वंद्व से परे और पार होना सीख लेता है, तो वह अपनी अभिरुचि को अपने लक्ष्य के अनुरूप सही बिंदु तक ले जाने में सक्षम हो जाता है। ऐसे में बौद्धिक बिखराव से बचा जा सकता है तथा विषय पर केंद्रित होने में सहायता मिलती है। अपनी बौद्धिक क्षमता को सबसे पहले किसी विषय की गहराई में लगाना चाहिए और फिर उसके विस्तार में जाना चाहिए। इससे विषय की बारीकी के साथ उसके अनेक पहलुओं के बीच संबंध स्थापित किया जा सकता है। इस प्रकार कई नए आयाम विकसित होते हैं। जिंदगी में भटकाव और बिखराव न हो, इसके लिए अपने निर्दिष्ट लक्ष्य के अनुरूप मन को गतिशील बनाए रखने में बुद्धि की अहम भूमिका है।

Bookmark and Share


अपने विचार यहां लिखें:
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: