इंग्लैंड में जब एक ब्रिटिश नागरिक ने हमारी संस्कृति और हमारे विविधतापूर्ण समाज का मजाक उड़ाया तो डॉक्टर राधाकृष्णन भी चुप नहीं रहे। उन्होंने उसे ऐसा जवाब दिया कि वह खिसियाकर रह गया।
बात उस समय की है जब हमारा देश गुलाम था और अंग्रेज जब-तब भारतीयों का उपहास उड़ाया करते थे, लेकिन कभी-कभी अंग्रेजों को भी भारतीयों की ओर से ऐसा करारा जवाब मिलता था कि उनके पास सिवाय बगलें झांकने के कोई और चारा नहीं रह जाता था।
ऐसा ही एक वाकया तब पेश आया, जब डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन इंग्लैंड में आयोजित एक सभा में भाषण देने गए। उन्हें हिंदुत्व का प्रकांड विद्वान समझा जाता था। डॉक्टर राधाकृष्णन ने जब अपना भाषण समाप्त किया तो संपूर्ण सभागृह तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इसके बाद भोजन आरंभ हुआ।
भोजन कक्ष में राधाकृष्णन के पास एक ब्रिटिश आया और उनसे पूछा - क्या हिंदू नामक कोई समाज है भी? क्या उसकी भी कोई संस्कृति है? तुम लोग बिखरे-बिखरे रहते हो। तुममें समानता बिल्कुल भी नहीं है। न सबका रंग एक जैसा है, न पहनावा ही। हम अंग्रेजों को देखो, सब एक जैसे रंग के और एक जैसी वेशभूषा धारण करने वाले हैं।
डॉ. राधाकृष्णन तत्काल बोले - घोड़े कभी एक जैसे रंग-रूप के नहीं होते किंतु गधों में ऐसी समानता अवश्य देखने को मिलती है। उनका जवाब सुन वह ब्रिटिश खिसियाकर रह गया। दरअसल भारत सदैव गंगा-जमुनी संस्कृति का वाहक रहा है।
विभिन्न संस्कृतियों के मध्य विरोध न होकर सहविकास की परंपरा भारत की विशेषता है, जो दुनिया में और कहीं और देखने को नहीं मिलती। इस विविधता में ही एकता के वे बहुमूल्य सूत्र मौजूद हैं, जो प्रत्येक क्षेत्र में भारत की निरंतर प्रगति के आधार हैं।