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पानी की तो लूट है, लूट सके तो लूट
पूनम मेहता Saturday, July 04, 2009 11:22 [IST]  

रहीमजी कह गए हैं ‘पानी राखिए’ पर अजी पानी रखता कौन है? हिंदुस्तान में तो सदा सलिला ही बहती है। पहले दूध-घी की नदियां बहती थीं, अब पानी की बहती हैं। फिर हम भला ‘पानी क्यों रखें’?

कभी नगर निगम के सार्वजनिक नल बहते हैं तो कभी सरकारी दफ्तरों के ‘जल बचाओ’ पोस्टरों पर दिन-रात पानी की धार चलती है।

घर की सफाई करनी हो या कार की धुलाई, पानी रखता कौन है? कूलरों से बहता पानी, सड़कों पर वॉटर वर्क्‍स के टूटे पाइपों से रिसता पानी, मोटर से चढ़ाकर टंकियों में लाया गया और फिर उसमें से बर्बाद होता पानी। सब हमारी अमीरी की निशानी हैं। फिर भला हम ‘पानी’ क्यों रखने लगे!

हाल ही में विदेश यात्रा से लौटे मेरे एक मित्र ने बताया कि वहां पानी सबसे महंगा है। दो डॉलर की एक बोतल, पर अपने देश में तो यह सब जगह मुफ्त है।

हिंदी फिल्म में हीरोइन जब तक सफेद वस्त्र पहनकर बरसात के पानी में ठुमके न लगा ले, मजाल है फिल्म चल जाए। कितने फिल्मी गाने तो बरसात के पानी की वजह से ही हिट हुए हैं। आजकल तो अपने हीरो भी पानी की धार के नीचे अपने सिक्स पैक एब दिखाने से नहीं चूकते। ऐसे में पानी रखने का सवाल ही कहां उठता है?

अब आप ही बताइए, होली पर जो मजा टंकियों में पक्का रंग डाल के डुबोने में आता है, वह भला पिचकारी से हौले-हौले रंग डालने में कहां आएगा। शॉवर के नीचे ठंडी-ठंडी फुहारों से जब तन-मन भीगता है तो भला कोई बाल्टी-मग में पानी क्यों रखेगा? यदि प्रशासन नलों के पानी पर राशनिंग लागू कर दें तो हम अपने जल अधिकारों को लेकर सड़कों पर उतर आएंगे।

नदी-जल बंटवारे में अपने राज्य को अधिकतम हिस्सा दिलवाने के लिए हम मर मिटेंगे, तो फिर भला पानी क्यों रखेंगे? यदि अपने नलों में पानी की सप्लाई का सही बिल हमें भरना पड़े या रिसते हुए नलों को सही करवाना पड़े तो लानत है हम पर। अब क्या हम भी पानी रखेंगे!

यह तो कुदरत की नेमत है। जहां चाहे घर बनवाओ और पीएचई की पाइप लाइन न हो तो घर में बोरिंग करवा लो, पानी ही पानी है। फिर उसका यूज करो या मिसयूज।

भूगोल की कक्षा में पढ़ा था कि पृथ्वी पर तीन चौथाई भाग पानी है इसलिए यह ‘नीला ग्रह’ भी कहलाती है, फिर कौन कहता है कि ‘जल बचाओ’। अजी समुद्र में तो पानी ही पानी है। फिर बारिश हो जाए तो पानी ही पानी।

सुना है ग्रीन हाउस इफेक्ट से धरती के तापमान में इतनी वृद्धि हो जाएगी कि ग्लेशियर भी पिघल जाएंगे। लो फिर, पानी ही पानी। तो फिर हम भला पानी क्यों रखें? आने वाली पीढ़ियां करेंगी खुद ही अपना बंदोबस्त। हमें कौन सी बेदाग पृथ्वी मिली थी।

अपने देश में तो वैसे भी लोकतंत्र है। कहने-सुनने, लिखने-पढ़ने की स्वतंत्रता है, फिर पानी पर हमारा नैसर्गिक अधिकार भी है। ऐसे में हम पानी में बहें या बहाएं, लुटें या लुटाएं, हमें रोकने-टोकने वाले वे कौन होते हैं? अब जब सदियों से बाहर वाले आकर हमारे देश के हीरे-जवाहरात लूट ले गए तो क्या हम अपना स्वयं का पानी भी नहीं लूट सकते!

हम तो पानी का जीते जी भरपूर लुत्फ उठाएंगे, आखिर रहीमजी ने भी तो कहा है बिन पानी सब सून..!

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