हर्ष मंदर- लेखक - भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं।
अब समय आ गया है कि हम इस बात को स्वीकार करें कि अपंगता, बीमारी, गरीबी, कलंक और उम्र के चलते हमारी चमकीली दुनिया से बेदखल व्यक्ति जीने के लिए भिक्षावृत्ति को निराशा के साथ तभी अपनाता है, जब उसके पास आजीविका का कोई और विकल्पनहीं होता। सरकार भी अपने समस्त नागरिकों को बुनियादी सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं करवा पाती।
भारत में कानून कई लिहाज से सरकारी अधिकारियों को हमारे सबसे ज्यादा असुरक्षित लोगों को कैद में रखने का अधिकार देता है। हमारी ज्यादातर जेल गरीब और अभावग्रस्त लोगों से भरी रहती हैं। इन दीन-हीन लोगों को महज छोटे-मोटे आरोपों में गिरफ्तार कर लंबे समय तक विचाराधीन कैदियों की तरह रखा जाता है।
कई अभावग्रस्त बच्चों का पूरा बचपन बाल सुधार गृहों में गुजर जाता है। सरकार या न्यायिक अधिकारियों द्वारा वेश्यावृत्ति जैसे कामों से बचाई गई महिलाओं को ‘नैतिक खतरे’ की दुहाई देते हुए कड़ी निगरानी में महिला गृहों में कैद रखा जाता है।
हमारे कानूनों की किताबों में सबसे ज्यादा गरीब विरोधी कानून संभवत: भिक्षावृत्ति संबंधी कानून ही हैं। वर्ष 1920 के आसपास भिक्षावृत्ति को रोकने के लिए कानून बनाया गया और इस औपनिवेशिक कानून के कई प्रावधान बाम्बे प्रिवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट, १९५९ में भी बरकरार रहे। यह कानून दिल्ली समेत 18 राज्यों में लागू किया गया है।
भिक्षावृत्ति की परिभाषा में ‘आजीविका का कोई साधन न होना’ शामिल है। यह अभावग्रस्तता को अपराध ठहराता है। चूंकि कई भिखारी कोढ़ या मानसिक बीमारियों से पीड़ित होते हैं, लिहाजा ये बीमारियां होना भी अपराध है। यहां तक कि पारंपरिक लोक कलाकारों को भी इससे जोड़ दिया जाता है क्योंकि ‘गाना, नाचना, भविष्य बतलाना’ भी इस एक्ट के अधीन अपराध की तरह माना जाता है।
कोई भी पुलिस अधिकारी बगैर किसी वारंट के किसी ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है, जो भिक्षावृत्ति की इस व्यापक परिभाषा के अधीन भीख मांगता पाया जाता है। इस ‘अपराध’ के लिए उन्हें मारा-पीटा, दुत्कारा और हिरासत में लिया जा सकता है।
मुझे नई दिल्ली के हनुमान मंदिर में भीख मांगने वाली उन बुजुर्ग महिलाओं के स्याह चेहरे आज भी याद हैं, जब उनके मैले-कुचैले बंडलों को (जिनमें उनकी पूरी दुनिया समाई थी) वहां छापा मारने वाली पुलिस टीम ने यूं ही आग में झोंक दिया।
ऐसे मामलों में आमतौर पर मनमाने ढंग से होने वाली मुकदमे की कार्यवाहियों के बाद यदि किसी व्यक्ति को भिखारी पाया जाता है तो उसे कम से कम एक साल की कैद हो सकती है, जिसे बढ़ाकर तीन साल तक किया जा सकता है।
इन भिखारियों को जिन भिक्षु गृहों में भेजा जाता है, उनकी दशा तो जेल से भी बदतर होती है, क्योंकि अपनी असहायता और अपंगता के चलते उन्हें तकरीबन चौबीसों घंटे ऐसी जगहों पर रहना पड़ता है जहां हमेशा मल-मूत्र और लोगों के गंदे शरीर की बदबू आती रहती है।
इनमें से कई लोग तो यहीं अकेले पड़े-पड़े दुनिया छोड़ देते हैं। कई लोगों का कोई परिवार नहीं होता, जो उनसे मिलने आए। इसके अलावा ऐसे भी लोग होते हैं जो शर्मिदगी के चलते इस बात की भनक अपने परिवार वालों को नहीं लगने देना चाहते कि उन्हें भिक्षावृत्ति के आरोप में हिरासत में लिया गया है।
चेन्नई में हमने पाया कि सरकार 116 तथाकथित भिखारियों को इसी हालत में रखने के लिए सालाना 36 लाख रुपए खर्च करती है, जिसमें से 86 फीसदी तो स्टाफ के वेतन पर खर्च हो जाता है। यह भिक्षा के आरोपी प्रत्येक कैदी पर प्रतिवर्ष 27 हजार रुपए खर्च करती है।
सरकार को इसके बजाय यह उचित नहीं लगता कि इसका कुछ हिस्सा इन अभावग्रस्त लोगों के पुनर्वास और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च कर दे। दिल्ली हाईकोर्ट की एक बेंच ने 7 फरवरी 2007 को दिल्ली सरकार को निर्देश दिया था कि वह राजधानी की सड़कों को भिखारियों से मुक्त कर उन्हें भिक्षु गृह में रखे। यह निर्णय नई दिल्ली बार एसोसिएशन द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर दिया गया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि लोगों को ऐसे ‘कोढ़ियों और भिखारियों’ से परेशान होना पड़ता है, जो ‘पैसा ऐंठने की कोशिश करते हैं’। ये क्रॉसिंग पर कार की खिड़कियों को लगातार ठकठकाते रहते हैं और यदि उन्हें पैसा नहीं दिया जाता तो ‘गंभीर नतीजे’ भुगतने की धमकी दी जाती है।
भिखारियों के अधिकारों के मामले में दिल्ली सरकार की आधिकारिक स्थिति पूर्वाग्रहों से ग्रस्त और सहानुभूति से विहीन है। शहर में लगे हर्ो्िडग्स कहते हैं कि भीख देने का मतलब भीख स्वीकारने वाले और देश दोनों को कमजोर करना है।
दिल्ली सरकार द्वारा प्रायोजित आधे पन्ने का अखबारी विज्ञापन अपने नागरिकों से कहता है कि उनके द्वारा दी गई भीख ट्रैफिक जाम, दुर्घटना, निरक्षरता, असुविधा, बेरोजगारी, लूट, डकैती, बलात्कार, सेक्स, चोरी, हत्या, वेश्यावृत्ति, विकलांगता, गुंडागर्दी इत्यादि की वजह बन सकती है। इससे झुग्गियों, गरीबी, कर्ज, अज्ञानता, अतिक्रमण, छेड़छाड़ को भी बढ़ावा मिल सकता है।
दूसरों के सामने पसरने वाले हाथों के खिलाफ ऐसी धारणा ज्यादातर इस बात पर आधारित है कि भिक्षावृत्ति माफिया द्वारा चलाई जाती है और भिखारी इस विकल्प को इसलिए अपनाते हैं क्योंकि इसके लिए उन्हें ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ता। दिल्ली में एक सैंपल सर्वे में हमने पाया कि भिक्षावृत्ति के 90 फीसदी मामलों में अति गरीबी, अक्षमता, बीमारी, परिवार का न होना और बेरोजगारी जैसे कारक जिम्मेदार हैं।
बच्चों ने बताया कि मां-बाप उन्हें भीख मांगने के लिए इसलिए मजबूर करते हैं, क्योंकि वे उनका पेट नहीं पाल सकते। हमने ऐसे चौंकाने वाले मामले भी देखे जहां स्कूली बच्चे भी भीख मांगते नजर आए। इस सर्वे में भिखारियों के माफिया का एक भी मामला सामने नहीं आया।
इसी तरह चेन्नई में हुए एक अध्ययन में 68.75 फीसदी भिखारी अशक्त या बीमार पाए गए। तकरीबन आधे भिखारी बूढ़े थे। भीख मांगने वाली ज्यादातर औरतें परित्यक्ता थीं। ज्यादातर भिखारियों को उनके परिवार वालों ने घर से बेदखल कर दिया है।
इनमें से तकरीबन सभी ने भिक्षावृत्ति को अपनाने से पहले कई छोटे-मोटे काम करते हुए अपनी जिंदगी में बहुत संघर्ष किया। कोढ़, पागलपन का दाग और कई तरह की अपंगता इनके लिए रोजगार पाना तकरीबन असंभव बना देती है।
गलियों में सामान बेचने जैसे कई काम सरकार ने प्रतिबंधित कर दिए हैं और सरकारी पेंशन अब भी बुजुर्ग और अपंगों की बहुत कम आबादी तक पहुंच पाती है। कई पारंपरिक कलाओं का अब कोई बाजार नहीं है। सामुदायिक मदद की व्यवस्था भी क्षीण हो चुकी है।
अब समय आ गया है कि हम इस बात को स्वीकार करें कि अपंगता, बीमारी, गरीबी, कलंक और उम्र के चलते हमारी चमकीली दुनिया से बेदखल व्यक्ति जीने के लिए भिक्षावृत्ति को निराशा के साथ तभी अपनाता है, जब उसके पास आजीविका का कोई और विकल्प नहीं होता।
सरकार भी अपने समस्त नागरिकों को बुनियादी सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं करवा पाती। ऐसे हालात में जैसा कि मुरुगनदम ने कहा, ‘लकवे की मार के बाद मेरे पास दो ही विकल्प थे, आत्महत्या या भिक्षावृत्ति। मैंने भिक्षावृत्ति को चुना।’ कौन कह सकता है कि वह गलत था?