Indore
विज्ञापन से तलाक देना मान्य नहीं
रुमनी घोष Sunday, July 05, 2009 03:14 [IST]  

womanइंदौर. विज्ञापन देकर तलाक देने वाले पति को सबक सिखाते हुए इंदौर कुटुम्ब न्यायालय के न्यायाधीश शशिमोहन श्रीवास्तव ने हाल ही में एक फैसला सुनाया। उन्होंने न सिर्फ इस तलाक को अमान्य किया बल्कि भरण-पोषण के लिए 2000 रु. प्रतिमाह देने का भी आदेश दिया। इस फैसले ने न सिर्फ एक मुस्लिम महिला वकील को हक की लड़ाई में जीत दिलाई बल्कि अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही अन्य महिलाओं के लिए भी पैगाम दिया।

खजराना निवासी 27 वर्षीय उरूसा सुल्ताना की शादी 7 फरवरी 2004 में कानोड़ (उदयपुर) निवासी सैयद मो. अखलाक से हुई थी। इस बीच दोनों को एक बेटी संजरी भी हुई। उरूसा के पिता अब्दुल जलील कुरैशी ने बताया मैं पीएचई में इंजीनियर था। रिटायरमेंट के बाद सैयद ने मांग रखी कि मैं पांच लाख रु. दूं या फिर इंदौर में किसी बड़े वकील के अधीन नौकरी पर लगा दूं। मैं नहीं कर पाया तो उसने उरूसा को घर से निकाल दिया।

फिर 26 जून 2006 को अखबारों में विज्ञापन देकर तलाक दे दिया। इसके खिलाफ उरूसा ने इंदौर के कुटुम्ब न्यायालय में दो केस लगाए। एक केस तलाकनामे को प्रभावहीन घोषित करवाने हेतु और दूसरा भरण-पोषण के लिए। बच्ची छोटी होने से उरूसा खुद केस नहीं लड़ पाई लेकिन वकील बहन जुल्फा सुल्ताना इसे लेकर कोर्ट तक पहुंची। सीनियर एडवोकेट सलीम खान की मदद से जुल्फा ने साबित किया कि यह तलाक शरीयत मोहम्मद के नियम मुताबिक नहीं है।



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