देश में लोकतंत्र है, इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण बजट के दिन देखने को मिलता है. एक ही बजट पर तमाम उद्योगपति और जानकार वित्तमंत्री को दो से लेकर दस नम्बर तक देते हैं। - शिवकुमार मिश्र
बजट एक ऐसे दस्तावेज को कहते हैं, जो सरकार के न होनेवाले इनकम और ज़रुरत से ज्यादा होनेवाले खर्चे का लेखा-जोखा पेश करता है। इसके साथ-साथ बजट को सरकार के वादों की किताब भी माना जा सकता है। एक ऐसी किताब जिसमें लिखे गए वादे कभी पूरे नहीं होते।
सरकार बजट इसलिए बनाती है जिससे उसे पता चल सके कि वह कौन-कौन से काम नहीं कर सकती। जब बजट पूरी तरह से तैयार हो जाता है तो सरकार अपनी उपलब्धि पर खुश होती है। इस उपलब्धि पर कि आनेवाले साल में बजट में लिखे गए काम छोड़कर बाकी सब कुछ किया जा सकता हैं।
सरकार का चलना और न चलना उसकी इसी उपलब्धि पर निर्भर करता है। कह सकते हैं कि सरकार है तो बजट है और बजट है तो सरकार है।
सबसे ऊंचा दर्जा
सरकार के तमाम कार्यक्रमों में बजट का सबसे ऊंचा स्थान है। बजट बनाना और बजटीय भाषण लिखना भारत सरकार का एक ऐसा कार्यRम है जो साल में सिर्फ एकबार होता है। सरकार के साथ-साथ जनता भी पूरे साल भर इंतजार करती है तब जाकर एक अदद बजट की प्राप्ति होती है।
वित्तमंत्री फरवरी महीने के अन्तिम दिन बजट पेश करते हैं। वैसे जिस वर्ष संसदीय लोकतंत्र की मजबूती जांचने के लिए चुनाव होते हैं, उस वर्ष ‘सम्पूर्ण बजट’ का मौसम देर से आता है।
बजट किसका
कुछ लोगों का मानना है कि बजट सरकार का होता है। वैसे जानकार लोग यह बताते हैं कि बजट पूरी तरह से उसे पढ़ने वाले वित्तमंत्री का होता है। बजट लिखने से ज्यादा महत्वपूर्ण काम बजट में ‘कोट’ की जाने वाली कविता के सेलेक्शन का होता है.
ऐसा इसलिए माना जाता है कि बजट पढ़ने पर तालियों के साथ-साथ कभी-कभी गालियों का महत्वपूर्ण राजनैतिक कार्यRम भी चलता है लेकिन बजटीय भाषण के दौरान जब मेहनत करके छांटी गई कविता पढ़ी जाती है तो केवल तालियाँ बजती हैं।
बजट में कोट की जाने वाली कविता किसकी होगी, ये वित्त मंत्री के ऊपर डिपेण्ड करता है। जैसे अगर वित्तमंत्री तमिलनाडु राज्य से होता है तो अक्सर कविता महान कवि थिरु वेल्लूर की होती है। अगर वित्तमंत्री पश्चिम बंगाल का हो तो फिर कविता कविगुरु रबिन्द्रनाथ टैगोर की होती है।
बजट का समय
भारतीय बजट का इतिहास पढ़ने से हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि पहले बजट की पेशी शाम को पाँच बजे होती थी। बाद में बजट की पेशी का समय बदलकर सुबह के 11 बजे कर दिया गया। ऐसा करने के पीछे मूल कारण ये बताया गया कि अँग्रेजी सरकार पाँच बजे शाम को बजट पेश करती है लिहाजा भारतीय सरकार भी अगर शाम को पाँच बजे बजट पेश करे तो उसके इस कार्यRम से अँग्रेजी साम्राज्यवाद की बू आएगी। बजट के आइटम
नब्बे के दशक तक बजटीय भाषणों में सिगरेट, साबुन, चाय, माचिस, मिट्टी के तेल, पेट्रोल, डीजल, एक्साईज, सेल्स टैक्स, इन्कम टैक्स, सस्ता, मंहगा जैसे सामाजिक शब्द भारी मात्रा में पाये जाते थे। लेकिन नब्बे के दशक के बाद में पढ़े गए बजटीय भाषणों में आर्थिक सुधार, डॉलर, विदेशी पूँजी, एक्सपोर्ट्स, इम्पोर्ट्स, एफडीआई, एफआईआई, फिस्कल डिफीसिट, मुद्रास्फीति, आरबीआई, ऑटो सेक्टर, आईटी सेक्टर, इन्फ्लेशन, बेल-आउट, स्कैम जैसे आर्थिक शब्दों की भरमार रही।
ऐसे नए शब्दों के इस्तेमाल करके विदेशियों और देश की जनता को विश्वास दिलाया जाता है कि भारत में बजट अब एक आर्थिक कार्यक्रम के रूप में स्थापित हो रहा है।
बजट के शिल्पकार
वैसे तो लोगों का मानना है कि बजट बनाने में पूरी की पूरी भूमिका वित्तमंत्री और उनके सलाहकारों की होती है लेकिन जानकारों का मानना है कि ये बात सच नहीं है. जानकार बताते हैं कि बजट के तीन-चार महीने पहले से ही औद्योगिक घराने और अलग-अलग उद्योगों के प्रतिनिधि %गिरोह% बनाकर वित्तमंत्री से मिलते हैं जिससे उनपर दबाव बनाकर अपने हिसाब से बजट बनवाया जा सके.
जानकारों की इस बात में सच्चाई है, ऐसा कई बार बजटीय भाषण सुनने से और तमाम क्षेत्रों में भारी मात्रा में दी जाने वाली छूट और लूट वगैरह को देखकर पता चलता है. कुछ जानकारों का यह मानना भी है कि सरकार ने कई बार बजट निर्माण के कार्य का निजीकरण करने के बारे में भी विचार किया था लेकिन सरकार को समर्थन देने वाली पार्टियों के विरोध पर सरकार ने ये विचार त्याग दिए.
बजट का भाषण कैसे लिखा जाए, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि कौन से पंथ पर चलने वाले सरकार को समर्थन दे रहे हैं. जैसे अगर सरकार को वामपंथियों से समर्थन मिलता है तो निजीकरण, सुधार जैसे शब्द भारी मात्रा में नहीं पाए जाते. उस स्थिति में सुधार की जगह उधार जैसे शब्द ले लेते हैं. वहीँ, अगर सरकार को समर्थन की ज़रुरत न पड़े तो फिर वो जो चाहे, जहाँ चाहे वैसे शब्द सुविधानुसार लिख लेती है.
बजट के मौसम में सामाजिक और राजनैतिक बदलाव भारी मात्रा में परिलक्षित होते हैं. बजटोत्सव के कुछ दिन पहले से ही वित्तमंत्री के पुतले की बिRी बढ़ जाती है. ऐसे पुतले बजट प्रस्तुति के बाद जलाने के काम आते हैं. कुछ राज्यों में %सरकार% के पुतले जलाने का कार्यRम भी होता है.
पिछले सालों में सरकार के वित्त सलाहकारों ने इन पुतलों की मैन्यूफैक्चरिंग पर इक्साईज ड्यूटी बढ़ाने पर विचार भी किया था लेकिन मामले को यह कहकर टाल दिया गया कि इस सेक्टर में चूंकि छोटे उद्योग हैं तो उन्हें सरकारी छूट का लाभ मिलना अति आवश्यक है.
पुतले जलाने के अलावा कई राज्यों में बंद और रास्ता रोको का राजनैतिक और सांस्कृतिक कार्यRम भी होता है. बजट का उपयोग सरकार को समर्थन देने वाली राजनैतिक पार्टियों द्वारा समर्थन वापस लेने की धमकी देने में भी किया जाता है.
बजट प्रस्तुति के बाद पुतले जलाने, रास्ता रोकने और बंद करने के कार्यRमों के अलावा एक और कार्यRम होता है जिसे बजट के %टीवीय विमर्श% के नाम से जाना जाता है. ऐसे विमर्श में टीवी पर बैठे पत्रकार और उद्योगपति बजट देखकर वित्तमंत्री को नम्बर देने का सांस्कृतिक कार्यRम चलाते हैं. लोकतंत्र पूरी तरह से मजबूत है, इस बात को दर्शाने के लिए ऐसे कार्यRमों में बीच-बीच में %आम आदमी% का वक्तव्य भी दिखाया जाता है.
भारतीय सरकार के बजटोत्सव कार्यRम पर रिसर्च करने के बाद हाल ही में कुछ विदेशी विश्वविद्यालयों ने अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों के पाठ्यRम में भारतीय बजट के नाम से एक नया अध्याय जोड़ने पर विमर्श शुरू कर दिया है. कुछ विश्वविद्यालयों का मानना है; %अगर भारत सरकार के बजट को पाठ्यRम में रखा जाय तो न सिर्फ अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों को लाभ मिलेगा अपितु राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी भी लाभान्वित होंगे.%
आशा है भारतीय सरकार के बजट की पढ़ाई एकदिन पूरी दुनियाँ में कम्पलसरी हो जायेगी. भारतीय बजट दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की करेगा.
खास पेशकश में खास क्या ?
कई दिनों से कई चैनल चिल्ला चिल्ला कर कह रहे थे कि इस बजट में देखिए हमारी खास पेशकश। लेकिन प्रणब दा के बजट की तरह न्यूज चैनलों की पेशकश भी कोई खास नहीं दिखी। स्टार न्यूज ने न्यूज रूम में ही विशेषज्ञों को बैठाकर पूरे बजट का विश्लेषण किया तो जी न्यूज पर पुण्य प्रसून अपने पुराने अंदाज में दिखे।
विकास प्रेमी पुण्य प्रसून ने मौका देखकर इस बात को कह ही दिया कि एक ओर प्रणब मुखर्जी किसानों का कर्ज सस्ता कर रहे हैं तो दूसरी ओर एलसीडी टीवी सस्ता कर रहे हैं। आखिर यह अंतर क्यों?
ब्लॉग पर बजट बातें
उधर बजट पेश हुआ इधर दुनियाभर के ब्लॉगर पोस्ट पर जुट गए। किसी से इस बजट को आम आदमी का बजट बताया तो किसी ने निराशा जताई है। सब मिलाकर बजट से खुश होने वाले कम ही हैं। मसलन नादान पत्रकार ब्लॉग पर लेखक लिखते हैं कि जब बात किसानों की शुरू हुई तो दादा से उम्मीदें बढ़ गई थीं लेकिन मुश्किल से दो मिनट में दादा ने किसानों की समस्याओं और उनके हल को समेट दिया।
बजट से दूर रहीं महिला एंकर
प्रिंट मीडिया की तुलना में न्यूज चैनलों में महिलाएं अधिक दिखती हैं। कम से कम आम धारणा तो यही है। लेकिन आज जब अर्थ का महोत्सव यानि बजट का मौका था तो अधिकांश चैनलों ने अपनी खूबसूरत एंकरों को कैमरे से दूर ही रखा।
एक के बाद एक चैनल देखने पर केवल इंडिया टीवी पर ही एक एंकर दिखी। जबकि न तो स्टार और एनडीटीवी पर कोई महिला एंकर दिखी। ऐसा क्यों। पता नहीं। कई ऐसा तो नहीं कि इन चैनलों के प्रमुख यह मानते हों कि बजट महिलाओं के वश की बात नहीं है।